जम्मू, ललित कुमार। धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू कश्मीर में बाल श्रम ने बच्चों की जिंदगी नरक बन गई है। रोजाना राज्य में ढाई लाख बच्चे बाल मजदूरी करते हैं। वर्ष 2001 की जन गणना के अनुसार राज्य में एक लाख 75 हजार बाल श्रमिक थे। 2011 के बाद इनका सर्वेक्षण ही नहीं हो सका है। अनौपचारिक विभागीय आंकड़ों के अनुसार राज्य में बाल श्रमिकों की संख्या ढाई लाख के करीब है। जम्मू-कश्मीर के माथे पर लगे बाल श्रम के कलंक को मिटाने के लिए आज तक सरकारी स्तर पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई। राज्य में वर्ष 2016 में इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम लागू की गई, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। बाल श्रम को लेकर इस कद्र उदासीनता है कि बीते 18 वर्षों में इसको लेकर कोई सर्वे ही नहीं हुआ।

वर्ष 2001 की जनगणना में राज्य में बाल श्रमिकों की संख्या 1,75,000 थी। 2011 में हुए जनगणना में इनका आंकड़ा नहीं जुटाया गया। अनौपचारिक आंकड़ों में इनकी संख्या करीब ढाई लाख है। बाल श्रमिकों का पता लगाने के लिए कोई कदम न उठाना उदासीन रवैये को दर्शाता है।

इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम के तहत स्टेट चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसायटी, डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, चाइल्ड वेलफेयर कमेटियां, स्टेट एडाप्शन रिसोर्स एजेंसी और स्टेट एडाप्शन एजेंसी बनाई जानी हैं। बाल श्रमिकों के लिए शॉर्ट स्टे होम भी होंगें। देखभाल के लिए आर्थिक सहायता भी दी जाएगी, लेकिन अभी तक शॉर्ट स्टे होम नहीं बने और न ही कमेटियों के चेयरमैनों की नियुक्ति हो सकी।

श्रम विभाग भी नहीं कर रहा परिश्रम : राज्य श्रम विभाग ने कभी अपने स्तर पर राज्य में काम करने वाले बाल श्रमिकों का डाटा जुटाने का प्रयास नहीं किया। कुछ निजी संस्थाओं ने प्रयास किया तो उसे मानने से इन्कार कर दिया। यही कारण राज्य में अभी तक बाल श्रम को रोकने के लिए कोई रुचि नहीं दिखाई। वर्ष 2016 में राज्य में इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम लागू हुई। केंद्र सरकार ने फरवरी 2016 में इसे मंजूरी दी और राज्य को फंड भी जारी किया था। मगर उसका भी सही ढंग से प्रयोग नहीं हो सका। वर्ष 2016 से पूर्व जम्मू-कश्मीर में चाइल्ड लेबर (रोकथाम व नियंत्रित) एक्ट 1986 लागू था। इसमें 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से श्रम नहीं करवाया जा सकता। इसमें बच्चों के पुनर्वास का प्रावधान नहीं था।

कानून में खामी : असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले बाल श्रमिक नहीं

मौजूदा कानून में एक सबसे बड़ी खामी है कि असंगठित क्षेत्र (ढाबे, किसी के घर) में काम करने वाले बच्चों को बाल श्रमिक नहीं मानता। न ही संबंधित एजेंसियां इसमें स्वयं संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकती हैं। अलबत्ता शिकायत मिलने पर कार्रवाई अवश्य हो सकती है। श्रम विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगर किसी फैक्टरी या किसी अन्य इकाई में कोई बच्चा काम करता है तो विभाग सीधी कार्रवाई कर सकता है। लेकिन किसी के घर में कोई बच्चा काम कर रहा है तो विभाग के हाथ बंधे हैं। अभी तक सरकार बाल श्रमिक की श्रेणी की स्पष्ट व्याखा नहीं कर पाई।

चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसायटी ने मांगा सहयोग : इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम को प्रभावी ढंग से लागू करने और आम लोगों को जोड़ने के लिए अब जेएंडके स्टेट चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसायटी ने जनता से सहयोग मांगा है। सोसायटी ने राज्य के 22 जिलों में डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट स्थापित कर अधिकारी मनोनीत कर मोबाइल नंबर सार्वजनिक किए है। जनता से अपील की जा रही है कि अगर किसी को कहीं भी कोई बाल श्रमिक दिखता है तो वे अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं।

18 वर्षों में नहीं हुआ सर्वेक्षण, अब जागी है कुछ उम्मीद

राज्य प्रशासनिक परिषद ने वूमन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट के डायरेक्टर जनरल पद को स्वीकृति देकर बाल श्रम की रोकथाम की उम्मीद जगाई है। आज तक बाल श्रम पर रोक लगाने में सबसे बड़ी समस्या यही थी कि सरकार के पास उनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं थी। जानकारों की मानें तो अब डायरेक्टर जनरल होने से विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के तहत बाल श्रमिकों का पुनर्वास संभव हो पाएगा।

  • हर जिले में चाइल्ड लाइन काम कर रही है। बाल श्रम रोकना और बाल श्रमिकों का पुनर्वास प्राथमिकता है। जब कहीं से भी बाल श्रम की कोई शिकायत आती है तो जिला प्रशासन व संबंधित चाइल्ड लाइन के सहयोग से कार्रवाई की जाती है। कोशिश है कि समाज से इस बुराई को समाप्त किया जा सके। -मंजरी सिंह, इंचार्ज चाइल्ड लाइन इंडिया फाउंडेशन जेएंडके
  • बाल श्रम रोकने के लिए विभाग लगातार काम कर रहा है। हर जिले में विशेष दस्ते गठित किए हैं। शिकायत मिलते ही त्वरित कार्रवाई की जाती है। बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए जिला स्तर पर चाइल्ड वेलफेयर कमेटियां बनाई हैं। कमेटी सदस्यों के टेलीफोन नंबर भी सार्वजनिक किए हैं। -बशीर अहमद खान, आयुक्त श्रम विभाग 

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Posted By: Rahul Sharma

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