कठुआ, राकेश शर्मा। जम्मू कश्मीर के समग्र विकास में 70 साल से रोड़ा बनी अनुच्छेद 370 से लोगों को अब केंद्र सरकार के प्रयास से निजात मिल चुकी है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा वर्ष 1953 में छेड़े गए आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले हीरानगर के दो वीरों ने भी अपना बलिदान दिया था, जिसमें गांव छन्न मोरियां का बिहारी लाल और दूसरा हीरानगर कस्बे के भीखम सिंह शामिल है।

उस समय दोनों की कुर्बानियों ने जम्मू कश्मीर के कठुआ जिले में अनुच्छेद के खिलाफ बड़ा आंदोलन का रूप ले लिया था। आंदोलन की शुरुआत जम्मू कश्मीर के मुख्य द्वार जिला कठुआ के लखनपुर के पास हुई। इधर दोनों वीरों ने हजारों आंदोलनकारियों के साथ 11 जनवरी 1953 को हीरानगर में जारी आंदोलन के दौरान हाथों में तिरंगा लहराते हुए उस समय की सरकार द्वारा चलाई गई गोलियों की परवाह न करते हुए कुर्बानी दे दी थी।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन से प्रेरित दोनों देशभक्त वीर भीखम सिंह और बिहारी लाल के परिवार में अब मात्र कुछ सदस्य ही बचे हैं, जो उनकी कुर्बानियों पर गर्व महसूस करते हैं। जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खिलाफ आवाज उठाकर अपनी कुर्बानी देने वाले दोनों वीरों को भाजपा अब तक उनके शहीदी दिवस 11 जनवरी को याद करती रही है और उनकी कुर्बानियों को जिंदा रखे हुए हैं। उस आंदोलन के नायक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कठुआ में गत जुलाई को भाजपा जम्मू कश्मीर में उनकी पहली मूर्ति स्थापित कर श्रद्धांजलि दे चुकी हैं।

हीरानगर में है दोनों वीरों की शहादत स्थल, जहां लगता है हर साल मेला : अनुच्छेद 370 के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले वीर भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी याद में उनके शहादत स्थल पर लगने वाले हर वर्ष 11 जनवरी को हीरानगर कस्बे में मेला किसी बड़े सम्मान से कम नहीं है। इस समारोह में देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी वाजपेयी वर्ष 1984 में जबकि 70 के दशक में लाला जगत नारायण, 90 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी, यज्ञदत्त शर्मा व मदन लाल खुराना के अलावा देश के कई शीर्ष भाजपा नेता हाजिरी लगा चुके हैं, जिससे उनकी याद में मनाए जाने वाला समारोह किसी बड़े शहीदी मेला से कम नहीं होता है। हजारों की संख्या में भाजपा कार्यकर्ता हर साल उनकी समाधि पर नमन करते हैं।

सरकार के आदेश पर आंदोलनकारियों पर चलाई गईं गोलियां

देशभक्ति का जज्बा रखने वाले हीरानगर क्षेत्र में जब वर्ष 1953 में आंदोलन हुआ था, तब मैं भी उसमें शामिल था। प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता रंजीत सिंह ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि मेरे सामने ही तत्कालीन गुलाम मोहम्मद बख्शी की सरकार के आदेश पर आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई गई, जिसमें भीखम सिंह और बिहारी लाल शहीद हुए और उनके साथ दो अन्य बद्री नाथ शर्मा व हीरानगर के चमन लाल घायल हुए थे। वो आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के काले अध्याय के खिलाफ आवाज उठाने वालों को उनकी पार्टी ने हमेशा याद रखा और नमन किया है। हालांकि सरकार की ओर से जिस तरह से उन्हें सम्मान दिया जाना चाहिए था, वो आज तक नहीं मिला है। भीखम सिंह हीरानगर कस्बे के निवासी थे। उनके परिवार में अब कर्ण सिंह ही बचे हैं।

  • बिहारी लाल की कोई अपनी औलाद नहीं थी। उनकी पत्नी रानो ने बेटी गोद ली थी, जिसकी अब शादी हो चुकी है। बिहारी लाल की पत्नी भी कुछ साल पहले ही चल बसी थी। भले ही आज वो नहीं है, लेकिन उनकी कुर्बानी को हमेशा याद किया जाएगा। आज उनकी कुर्बानी की वजह से ही जम्मू कश्मीर के लोगों को याद किया जाएगा। - रंजीत सिंह, वरिष्ठ प्रदेश भाजपा नेता, जम्मू कश्मीर

हीरानगर में है दोनों वीरों की शहादत स्थल, जहां लगता है हर साल मेला

अनुच्छेद 370 के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले वीर भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी याद में उनके शहादत स्थल पर लगने वाले हर वर्ष 11 जनवरी को हीरानगर कस्बे मेंं मेला किसी बड़े सम्मान से कम नहीं है। इस समारोह में देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी वाजपेयी वर्ष 1984 में जबकि 70 के दशक में लाला जगत नारायण, 90 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी, यज्ञदत्त शर्मा व मदन लाल खुराना के अलावा देश के कई शीर्ष भाजपा नेता हाजिरी लगा चुके हैं, जिससे उनकी याद में मनाए जाने वाला समारोह किसी बड़े शहीदी मेला से कम नहीं होता है। हजारों की संख्या में भाजपा कार्यकर्ता हर साल उनकी समाधि पर नमन करते हैं।  

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