दूध का कारोबार धड़ल्ले से, गोबर का ठिकाना नहीं, जम्मू में 237 डेयरियां बिना पंजीकरण; नियमों की उड़ रहीं धज्जियां
जम्मू में कुल 345 डेयरियों में से 237 अवैध रूप से संचालित हो रही हैं, जो प्रतिदिन 40-50 टन गोबर ...और पढ़ें

जम्मू में अवैध डेयरियों की मनमानी से बेपटरी हुई स्वच्छता व्यवस्था। (फाइल फोटो)
HighLights
जम्मू में 237 डेयरियां बिना पंजीकरण अवैध रूप से संचालित।
95% डेयरियों के पास गोबर निस्तारण का वैज्ञानिक प्रबंध नहीं।
अवैध डेयरियां प्रतिदिन 40-50 टन गोबर फेंककर प्रदूषण फैला रहीं।
अंचल सिंह, जम्मू। मंदिरों के शहर जम्मू की रिहायशी बस्तियों में नियमों को ताक पर रखकर चल रहीं डेयरियां अब नगर निगम की स्वच्छता व्यवस्था के लिए नासूर बन चुकी हैं। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद डेयरी संचालक अभी तक अपने स्तर पर कचरे का निस्तारण नहीं कर रहे। नगर निगम के ताजा आंकड़ों की पड़ताल करें तो हकीकत बेहद चौंकाने वाली है।
जम्मू नगर निगम की सीमा के भीतर कुल 345 डेयरियां संचालित हो रही हैं, लेकिन इनमें से निगम के पास केवल 108 डेयरियां ही पंजीकृत हैं। यानी 237 डेयरियां पूरी तरह गैरकानूनी और बिना किसी वैध पंजीकरण के शहर के बीचों-बीच चल रही हैं। शहर की इन डेयरियों से रोजाना लगभग 40 से 50 टन गोबर निकलता है।
चिंताजनक पहलू यह है कि 95 प्रतिशत से अधिक इकाइयों के पास गोबर के निस्तारण का कोई वैज्ञानिक प्रबंध नहीं है। महज पांच प्रतिशत डेयरियों ने ही बायोगैस प्लांट या वर्मी कम्पोस्टिंग पिट तैयार किए हैं।
अधिकतर खुले में फेंकते हैं गोबर
निगम की सख्ती के बाद अब कुछ डेयरी वालों ने गोबर व अन्य कचरे को निगम को सौंपना शुरू किया है जिसकी एवज में निगम इनमें 2000 रुपये मासिक यूजर लेता है। हालांकि निगम के अधीन खुले क्षेत्रों अथवा आसपास के इलाकों में डेयरी वाले गोबर व कचरे को खेतों आदि में डाल रहे हैं।
नियमों और मानकों की अवहेलना
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कड़े नियम हैं कि अधिक कचरा पैदा करने वाली बड़ी डेयरियों को बल्क वेस्ट जेनरेटर माना जाएगा, जिन्हें अपने ही परिसर में अपशिष्ट का वैज्ञानिक निस्तारण करना अनिवार्य है। इसके तहत गोबर और चारे के अवशेष को गीले कचरे के रूप में वर्गीकृत कर खाद या बायोगैस में बदलना जरूरी है।
नियमों के मुताबिक भूजल को सुरक्षित रखने के लिए डेयरी का फर्श पक्का होना चाहिए ताकि दूषित पानी जमीन में न रिसे। इसके अलावा अपशिष्ट जल बहाने से पहले ठोस कचरे को अलग करने के लिए सेटलिंग टैंक का निर्माण, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी लेना और प्रति मवेशी अधिकतम 150 लीटर पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल का नियम तय है।
मास्टर प्लान के तहत इन व्यावसायिक इकाइयों को घनी आबादी से दूर निर्धारित डेयरी जोन में होना चाहिए, मगर शहर के बीचों-बीच नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
दूध का बड़ा कारोबार लेकिन जवाबदेही शून्य
जम्मू-कश्मीर में प्रतिदिन करीब 70 लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है, जिसमें अकेले जम्मू संभाग की हिस्सेदारी लगभग 30 लाख लीटर है। बाजार में मांग इतनी अधिक है कि 50 से 70 रुपये प्रति किलो बिकने वाला यह दूध हाथों-हाथ बिक जाता है।
डेयरी संचालक भारी मुनाफा तो कमा रहे हैं, लेकिन जब बात शहर के पर्यावरण और नागरिक सुविधाओं की आती है, तो उनकी जवाबदेही शून्य नजर आती है। मोटी कमाई करने वाले ये संचालक गोबर निपटान के आसान वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने से बचते हैं।
यदि परंपरागत तरीकों के बजाय पॉलीथीन शीट से ढककर खाद बनाने की आधुनिक विधि अपनाई जाए, तो महज डेढ़ से दो माह में दुर्गंध रहित जैविक खाद तैयार हो सकती है और मीथेन गैस का फैलाव रुकने से पर्यावरण भी सुरक्षित रह सकता है।
क्या कहते हैं अधिकारी
जम्मू नगर निगम के पशु कल्याण अधिकारी डॉ. गौरव चौधरी बताते हैं कि गोबर को खाद या बायोगैस में बदलने का पुख्ता तंत्र स्थापित करने वाली डेयरियों का ही पंजीकरण किया जा रहा है। जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं होती, तब तक संचालकों को निगम के सुपरवाइजर या सेनेटरी इंस्पेक्टर के माध्यम से यह कचरा कोट भलवाल डंपिंग साइट भिजवाने के निर्देश हैं। इनसे प्रति माह 2 हजार रुपये यूजर चार्ज लिया जा रहा है। कुछ डेयरियां सील भी की गई हैं। सख्ती करने के साथ कार्रवाई कर रहे हैं।
