जम्मू, राज्य ब्यूरो। हरियाणा विधानसभा और जम्मू-कश्मीर में ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल के चुनाव परिणामों में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिलने से भाजपा अपनी रणनीतियों पर सोचने को मजबूर हो गई है। इतना ही नहीं, इन चुनाव परिणामों ने हाशिए पर चली गई कांग्रेस और अन्य दलों को संजीवनी दे दी है। अब ये दल अपनी सियासी जमीन को पुनर्जीवित करने के लिए सक्रिय हो गए हैं। इन दलों को लगने लगा है कि अब लोग भाजपा की नीतियों से खुश नहीं हैं और विकल्प तलाश रहे हैं।

दरअसल, भाजपा को उम्मीद थी कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों समेत जम्मू कश्मीर में बीडीसी चुनावों में पार्टी का बेहतरीन प्रदर्शन रहेगा। जम्मू कश्मीर में सभी प्रमुख दलों के बीडीसी चुनाव से बहिष्कार करने के कारण और भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी। राष्ट्रवाद और अनुच्छेद 370 और 35-ए हटने का सीधा लाभ मिलने की भाजपा आस लगाए थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भले ही प्रदेश भाजपा के नेता दावा कर लें कि उनके 307 ब्लॉकों में हुए चुनावों में उसके 81 उम्मीदवार जीत हैं और कई वे निर्दलीय भी जीते हैं जिन्हें पार्टी ने अपना समर्थन दिया। परंतु अधिकांश नेता इससे संतुष्ट नहीं हैं।

बीडीसी चुनावों में 217 निर्दलीय जीते हैं। उधर, कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि हरियाणा और जम्मू कश्मीर में चुनाव परिणामों से साफ है कि लोग भाजपा का विकल्प चाहते हैं। कांग्रेस जल्दी ही जमीनी स्तर पर अभियान शुरू करेगी।

भाजपा बदलेगी रणनीति, लोगों के मुद्दे उठाएगी

बीडीसी चुनावों में प्रदर्शन अपेक्षा से कम रहने पर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। पार्टी अब लोगों के बीच जाकर फिर से उनके मुद्दे उठाकर उनका विश्वास जीतने की रणनीति बना रही हे। बीडीसी चुनावों में भाजपा को तमाम दलों के चुनाव बहिष्कार के बावजूद सिर्फ किश्तवाड़ जिले में ही पचास प्रतिशत से अधिक सफलता मिली। इस जिले में 13 में से सात चेयरपर्सन ही भाजपा को मिले। अन्य जिलों में भाजपा का प्रदर्शन सही नहीं रहा। अब भाजपा के प्रदेश प्रधान की अध्यक्षता में कई नेता लोगों के मुद्दे उठाने की रणनीति बना रहे हैं। सरोर में टोल प्लाजा मुद्दा भी इसी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा के प्रदेश प्रधान रङ्क्षवद्र रैना कह चुके हैं कि पार्टी नेता लोगों के बीच जाएं और उनके मुद्दे उठाएं।

कांग्रेस व अन्य दलों में उत्साह

बीडीसी चुनावों ने जम्मू-कश्मीर में भाजपा विरोधी कई दलों को संजीवनी देने का काम दिया है। संसदीय चुनावों में बुरी तरह से मात खाने वाले दल हाशिये पर चल रहे थे, उनकी गतिविधियां जमीनी स्तर पर न के बराबर ही थी। जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन होने के बाद इन दलों के कई नेता नजरबंद थे। यही कारण था कि बीडीसी चुनावों की जब घोषणा हुई तो पहले इनमें भाग लेने को तैयार दिख रही कांग्रेस ने बाद में चुनावों का बहिष्कार करने की घोषणा कर दी। उन्हें लग रहा था कि अगर वे चुनावों में भाग लेते भी हैं तो शायद परिणाम उसके अनुरूप नहीं आएंगे। लेकिन जब परिणाम आए तो अधिकांश निर्दलीयों के जीतने से इन दलों को संजीवनी मिल गई। इसके बाद ये दल फिर से अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने में जुट गए हैं। कांग्रेस ने बीडीसी चुनाव परिणाम को भाजपा की हार तक कह दिया।  

Posted By: Rahul Sharma

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