जम्मू, जागरण संवादददाता : संतान की लंबी आयु के लिए श्री गणेश संकष्ट चतुर्थी, भुग्गा व्रत डोगरा परिवारों में महिलाओं ने पूरी धार्मिक आस्था और श्रद्धा के साथ रखा। दिन भर महिलाओं ने निर्जल व्रत रखा और भगवान श्री गणेश जी की पूजा अर्चना की। बहुत सी महिलाओं संकट चतुर्थी, उद्यापन, मोख भी किया। हालांकि कोरोना सावधानियों के चलते कही कोई सामूहिक आयोजन नहीं हो सका। मंदिरों में भी श्रद्धालुओं का तांता नहीं लगने दिया। महिलाएं एक-एक कर पूजा करती रही।

अधिकतर महिलाओं ने पूजा अर्चना घर में ही करना उचित समझा। रात्रि 9.06 मिनट के बाद चंद्रोदय के बाद व्रतधारी महिलाओं ने रात्रि को चांद को अर्घ्य देकर श्रद्धा पूर्वक बच्चों के नाम का भुग्गा निकालकर अलग रखा। इसके साथ मूली, गन्ना भी रखा। जिसे बाद में कुल पुरोहित व कन्याओं को बांटा गया।इसके बाद महिलाओं ने व्रत खोले।इस व्रत को निर्जल रखा जाता है और कुछ भी खाना नहीं होता। जिसके चलते इस व्रत को काफी कठिन व्रत माना जाता है। लेकिन व्रत रखने वाली महिलाओं का दृढ विश्वास है कि परिवार के लिए किसी भी मुश्किल का सामना कर सकती हैं। फिर व्रत तो प्रभु कृपा से कोई भी मुश्किल नहीं होता।

हालांकि पूरा दिन पूजा की तैयारियों में निकल गया। तिल व गुड़ को पीस कर भुग्गे का विशेष प्रसाद तैयार किया गया।महिलाएं इस व्रत की कथा पढ़ने एवं सुनने में व्यस्त रही।हालांकि प्रसाद के लिए महिलाओं ने घरों में ही बनाया लेकिन हलवाई की दुकानों पर भी भुग्गे की खूब खरीददारी हुई। इस व्रत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पंडित कर्ण थरमट ने बताया कि महाभारत काल में श्रीकृष्ण की सलाह पर पांडु पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने सबसे पहले सकट चौथ व्रत को ही रखा था। तब से लेकर अब तक सभी महिलाएं अपने पुत्र की सफलता के लिए सकट चौथ व्रत रखती हैं। इस व्रत की और भी कई कथाएं प्रचलित है।

भुग्गे से कम होने लगती है ठंड : डुग्गर संस्कृति में भुग्गे को व्रत को मौसम के बदलाव से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि भुग्गे के व्रत के साथ ही ठंड कम होने लगती है और इस दिन के बाद हाथ-पांव जमाने वाली ठंड नहीं रहती।

Edited By: Rahul Sharma