जम्मू, जागरण संवाददाता। बारिश के मौसम में मवेशी में गलघोटू और लंगड़ी बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में पशुपालकों को इसके लिए विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है। गलघोटू व लंगड़ी दोनों बीमारियां जीवाणुओं से होती है। इसमें मवेशी की जान तक जा सकती है।

शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी में पशु औषधि विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नीलेश शर्मा ने पशुपालकों को इस बीमारी के बारे में जागरूक रहने के लिए कहा है। उन्होंने बताया कि गलघोटू बीमारी पास्चुरेला मल्टोसिडा नामक जीवाणु से होती है। यह जीवाणु मुख्यतया गाय व भैंस पर हमला करता है। मवेशी के गले में ये जीवाणु बने रहते हैं, जो उसे बीमार कर देते हैं। प्रभावित मवेशी के गोबर, मूत्र व लार में इस बीमारी के कीटाणु बड़ी मात्र में होते हैं, जो दूसरे मवेशी तक पहुंच सकते हैं। जिस मवेशी पर ये जीवाणु हमला करते हैं वे चारा खाना बंद कर देते हैं व सुस्त हो जाते हैं। मवेशी को बुखार हो जाता है और मुंह से लार गिरने लगती है। मवेशी के गले में सूजन आ जाती है और उसे सांस लेने में दिक्कत होती है। सूजन की वजह से मवेशी दर्द महसूस करता है।

इस बीमारी में मवेशी का इलाज तभी संभव है जब प्रारंभिक अवस्था में इलाज करवा लिया जाए। ऐसा नहीं होने पर 24 घंटे के अंदर मवेशी की जान भी जा सकती है। इसलिए पशुपालकों को बीमारी का पता चलते ही तुरंत पशु चिकित्सक के पास पहुंचना चाहिए। वहीं, लंगड़ी (जहरवाद) भी बारिश के दिनों में होने वाली बीमारी है, जो कि छह माह से 18 माह तक के बछड़ों को अपना शिकार बनाती है। इस बीमारी में भी मवेशी को तीव्र बुखार हो जाता है। मवेशी खाना पीना बंद कर देता है व जुगाली भी नहीं करता। इस बीमारी में मवेशी के पैरों के ऊपरी भाग व कंधों व पुटठों (जांघ) की मांसपेशियों में सूजन आ जाती है। मवेशी लंगड़ाने लगता है व सूजन शरीर के दूसरे भागों में भी पहुंचने लगती है।

सूजन को दबाने पर चड़-चड़ की आवाज आती है। समय पर इलाज न हुआ तो जान भी जा सकती है। मवेशियों को बचाने के लिए बरसात से पहले टीकाकरण जरूरी है। टीका उचित तापमान में सुरक्षित रखा होना व उसकी उचित मात्र जरूरी है। अगर बीमारी के लक्षण दिखें, तो मवेशी पालक तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करे।

अपने मवेशियों के लिए लगाएं नेपियर घास

किसानों के सामने मवेशी चारा की कमी एक बड़ी समस्या है। मवेशी तो खरीद लेंगे मगर चारा की उपलब्धता को भी यकीनी बनाया जाना चाहिए। इसलिए किसानों को कुछ हटकर सोचना होगा। कृषि विशेषज्ञ सागर शर्मा ने किसानों को नेपियर घास की जानकारी दी है। हाईब्रीड नेपियर घास पौष्टिकता से भरपूर होती है व साल भर हरी रहती है। ऊधमपुर, जम्मू, कठुआ जैसे क्षेत्रों में इस हाईब्रीड घास लगाने का अच्छा मौसम है। जुलाई-अगस्त मध्य से पहले पहले नेपियर की लेट वैरायटी घास लगाई जा सकती है। अगर नहीं लगा पाए तो फिर फरवरी-मार्च माह का इंतजार करना पड़ेगा। एक हेक्टेयर भूमि में 18 से 20 हजार घास की जड़ लगाई जा सकती है। कृषि विभाग से सब्सिडी पर घास की जड़ प्राप्त की जा सकती हैं। घास की जड़ लगाते समय ध्यान रखें कि पौधों के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए। एक कतार से दूसरी कतार की दूरी 80 सेंटीमीटर हो। 50 से 60 दिन में घास की पहली कटिंग की जाती है व दूसरी कटिंग अगले एक से सवा माह में की जा सकती है। ठीक से खेती की जाए तो एक हेक्टेयर में एक हजार क्विंटल घास एक साल में प्राप्त की जा सकती है।

मशरूम के बीज का करें बंदोबस्त

अगर किसान मशरूम की खेती के बारे में सोच रहा है तो उसे सबसे पहले बीज की बुकिंग कराने के बारे में सोचना चाहिए। इन दिनों कृषि विभाग में बीज की बुकिंग की जा रही है। अगर आप बटन मशरूम लगाना चाहते हैं तो सबसे पहले बीज की बुकिंग कराएं। बाद में बीज की उपलब्धता नहीं हो पाएगी। शेड का भी मुआयना कर लें, जहां मशरूम की खेती करनी है। अगर कोई टूट-फूट हो तो उसे ठीक कर लें। बटन मशरूम की खेती जम्मू में डेढ़ माह बाद लगती है, लेकिन उसकी तैयारी अभी से की जानी चाहिए।

खास बातों का रखें ध्यान

  • - सब्जियों के खेतों में बरसात का पानी न जमा होने दें।
  • - माल मवेशियों को साफ-सुथरा पानी ही पिलाएं।
  • - मधुमक्खियों की कॉलोनियों को चीटियों की पहुंच से बचाएं।
  • - इन दिनों घास में सांप भी हो सकते हैं। ऐसे में डंडे से घासफूस को हिलाते हुए आगे बढ़ें। 

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप

Posted By: Rahul Sharma