जम्मू-कश्मीर में 70 फीसद लोग खेतीबाड़ी से जुड़े हुए हैं। किसान हमारे लिए अनाज पैदा करता है। यही किसान आज देश का अन्नदाता है। बदलते जमाने में खेती भी बदल गई है। कुछ उन्नत किसान नए तरीके से खेती कर रहे हैं जबकि अधिकतर पुरानी पद्धति ही अपना रहे हैं। खेती को लाभकारी बनाने के लिए किसानों को भी बदलना होगा। इसके बारे में दैनिक जागरण के वरिष्ठ संवाददाता गुलदेव राज ने कृषि विभाग जम्मू के उप निदेशक (केंद्रीय) रविंद्र थपलू से बातचीत की। पेश है बातचीत के कुछ अंश।

  • जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने पर खेतीबाड़ी को आप किस तरह से देख रहे है?

खेती बाड़ी में और विकास होगा। क्योंकि पहले हमें केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत केंद्र से तो फंडिंग मिलती ही थी लेकिन राज्य सरकार से उतना पैसा नहीं मिल पाता था। अब जम्मू-कश्मीर की सरकार से भी अच्छी फंडिंग हुई है। इससे किसानों के विकास के लिए चलने वाली योजनाओं को बल मिलेगा। अधिक से अधिक किसानों को योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। अब हम अधिक से अधिक किसानों को सरकारी योजनाओं से जोड़ सकेंगे।

  • योजनाएं बहुत हैं लेकिन किसानों के जीवन में बदलाव नहीं आ रहा। क्या किया जाए?

बदलाव तभी होगा जब किसान खुद को बदलेगा। अब किसानों को समझदार होना होगा। वैज्ञानिक खेती अपनाकर खेती के खर्च को घटाना होगा। वहीं, नए उपकरण का इस्तेमाल कर समय की भी बचत करनी होगी। साल में अधिकतम फसलें लेनी होगी। सबसे बड़ी बात किसानों को मार्केट के ट्रेंड को समझना होगा। कौन सी चीज कब लगानी है कि जब पैदावार हो तो उसकी मार्केट में मांग बने। अधिकांश किसानों के साथ हो यह रहा है कि जब तक उनका उत्पाद मार्केट में आता है, उससे पहले पंजाब से माल आ पहुंचता है। अब जम्मू का किसान समझदार हुआ है। ग्रीन हाउस व पॉली हाउस स्थापित पर नियंत्रित तापमान में समय से पहले सब्जियां तैयार कर मार्केट में अपनी पकड़ बना रहा है। यह काम दूसरे किसान भी तो कर सकते हैं। हम किसानों को प्रेरित करने में लगे हुए हैं। तालाब तिल्लो में हाइटेक ग्रीन हाउस भी बनाया गया है ताकि किसान देखे कि इसके अंदर अप्रैल में ली जाने वाली पनीरी जनवरी माह में ली जा रही है।

  • ग्रीन हाउस या पॉली हाउस लगाना इतना आसान नहीं, पैसा चाहिए। किसान खासकर ग्रामीण युवा इसका कैसे बंदोबस्त करेगा?

कृषि विभाग इसके लिए सब्सिडी देता है। यह जरूर है कि किसानों को ग्रीन हाउस के लिए पैसा लगाना पड़ता है लेकिन किसानों की कमाई भी तो हो रही है। मंडाल फलाएं में स्थापित ग्रीन हाउस को देखें कि वहां किसान किस तरह से अपनी आमदनी कर रहे हैं। वैसे भी किसान छोटे स्तर का भी ग्रीन हाउस बना सकते हैं। पॉली हाउस के लिए बहुत ज्यादा पैसे की जरूरत नहीं है। बस किसानों को नया कुछ करने की सोच बनाने की जरूरत है।

  • ग्रामीण युवा खेती में अपना बेहतर रोजगार का सपना कैसे साकार कर सकता है? उसके पास तो बहुत ज्यादा जमीन भी नहीं है।

कृषि से अच्छे से अच्छा रोजगार संभव है। बस मेहनत के साथ समझदारी दिखानी होगी। अगर जमीन बहुत कम है तो भी कुछ न कुछ बेहतर किया जा सकता है। सबसे पहले ग्रामीण युवाओं को खेती को एक उद्योग के रूप में लेना होगा। मधुमक्खी पालन का काम बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। इसके लिए ग्रामीण युवा को अपनी जमीन की जरूरत नहीं है। बस काम करने की लगन उसमें चाहिए। जम्मू कश्मीर का सोलाई शहद की देश भर में मांग है। मशरूम की खेती अब तकरीबन पूरे साल ही की जा सकती है।

  • एकीकृत खेती के बारे में क्या जानकारी देंगे?

यही कि आज जमाना यह भी है कि खेती के साथ साथ इससे जुड़े काम भी किए जाएं, इसी से किसान को लाभ होगा व किसान की आमदनी बढ़ेगी। जैसे किसी किसान के पास अगर चार पांच कनाल भूमि है तो वह एक साथ अनेक काम कर सकता है। फार्म हाऊस बनाकर कर एकीकृत खेती को अपना सकता है। अपने फार्म हाउस में गेहूं, सब्जियां, फूल, फल आदि लगा सकता है मगर साथ ही साथ एक कोने में मशरूम का यूनिट, डेयरी, मधुमक्खी पालन, केंचुआ खाद का यूनिट भी लगा सकता है।

  • किसानों की मार्केटिंग को बेहतर करने के लिए कृषि विभाग कुछ सोच रहा है ?

सोच ही नही रहा बल्कि सपने को हकीकत में बदलने का काम भी शुरू हो गया है। कृषि विभाग कठुआ के किसानों को जल्दी ही मंडी दिलाने जा रहा है। इसके लिए कठुआ में जमीन देख ली गई है और इसके लिए पैसे भी आ गए हैं। जल्दी ही चहारदीवारी करके मंडी बनाने का काम शुरू हो जाएगा। दूसरी मंडी अखनूर में बनाई जाएगी।

Posted By: Rahul Sharma

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