बुजुर्ग के सम्मान की जीत, पिता को सताने वाले बेटे-बहू घर से होंगे बेदखल; जम्मू में डोडा ट्रिब्यूनल का बड़ा फैसला
डोडा अपीलीय ट्रिब्यूनल ने एक ऐतिहासिक फैसले में 70 वर्षीय बुजुर्ग नियाज अहमद की अपील स्वीकार करते हुए उनके बेटे ...और पढ़ें

पिता को सतान वाले बेटे-बहू को संपत्ति खाली कर कब्जा सौंपने का आदेश। (Ai Generated)
HighLights
डोडा ट्रिब्यूनल ने बुजुर्ग पिता की अपील स्वीकार की।
बेटे-बहू को स्व-अर्जित संपत्ति से बेदखल करने का आदेश।
वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में ऐतिहासिक फैसला।
डिजिटल डेस्क, जम्मू। जम्मू-कश्मीर के डोडा में वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक नजीर बनने वाला फैसला आया है। अपीलीय ट्रिब्यूनल ने 70 वर्षीय बुजुर्ग नियाज अहमद की अपील स्वीकार करते हुए उसके बेटे शेराज अहमद और बहू आफशा बेगम को उसकी खुद की खरीदी हुई संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दिया है। यह आदेश माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम के तहत दिया गया। ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता जिला मजिस्ट्रेट डोडा कृष्ण लाल ने की।
वकील आसिफ नवाज बंडे के अनुसार, 22 अक्टूबर को जारी 19 पन्नों के आदेश में ट्रिब्यूनल ने मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल के पहले के आदेश को संशोधित किया। पहले ट्रिब्यूनल ने बेदखली से इन्कार करते हुए केवल बेटे-बहू को बुजुर्ग के शांतिपूर्ण कब्जे, जीवन और संपत्ति में दखल न देने का निर्देश दिया था।
अपीलीय ट्रिब्यूनल ने माना कि केवल रोक लगाने से बुजुर्ग को प्रभावी सुरक्षा नहीं मिल सकती। संपत्ति देसा रोड, डोडा में 10 मरला जमीन पर बना दो मंजिला मकान है, जिसे नियाज अहमद ने 16 जून 2003 को रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए खरीदा था। बुजुर्ग ने दो जुलाई को अपील दायर की थी।
बेटा और बहू पर प्रताड़ित करने का आरोप
अपील में बुजुर्ग ने आरोप लगाया था कि बेटा और बहू उसे प्रताड़ित करते हैं, धमकाते हैं, मारपीट करते हैं और उसके शांतिपूर्ण कब्जे में बाधा डालते हैं। फरवरी में जब वह कुछ समय के लिए घर से बाहर गए थे, तो आरोपितों ने मकान के अतिरिक्त हिस्सों पर कब्जा कर लिया। परिसर में बनी एक दुकान उनकी आजीविका का स्रोत है और उस पर कब्जे से उनकी रोजी-रोटी प्रभावित हुई है।
वकील के अनुसार, यह मामला एक दर्दनाक पारिवारिक विवाद है, जिसमें चार साल पहले पत्नी की मृत्यु के बाद पिता और बेटे के बीच दूरी बढ़ गई। बुजुर्ग ने 20 जनवरी 2023 को बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का रजिस्टर्ड डीड भी पेश किया। दूसरी ओर, बेटे-बहू ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि यह मामला मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में नहीं चल सकता और कब्जे व संपत्ति के अधिकार का फैसला सिविल कोर्ट में होना चाहिए।
उन्होंने घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत चल रही कार्यवाही का भी हवाला दिया। रिकार्ड की जांच के बाद ट्रिब्यूनल ने माना कि बुजुर्ग का स्व-अर्जित संपत्ति पर मालिकाना हक और वरिष्ठ नागरिक होने की स्थिति निर्विवाद है। प्रताड़ना, धमकी और मारपीट के आरोपों और सुरक्षा व शांतिपूर्ण जीवन की चिंताओं को सामूहिक रूप से देखना होगा।
बुजुर्गों के जीवन, संपत्ति और सम्मान की रक्षा जरूरी
ट्रिब्यूनल ने यह भी नोट किया कि स्थायी निषेधाज्ञा के लिए दायर सिविल मुकदमा 5 मार्च को खारिज हो चुका है, इसलिए अन्य कार्यवाहियों के अस्तित्व से मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र समाप्त नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले सहित कानूनी नजीरों का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक के जीवन, संपत्ति, सम्मान और शांतिपूर्ण जीवन की रक्षा के लिए जरूरी होने पर बेदखली का आदेश दिया जा सकता है।
30 दिन के भीतर आदेश को लागू करने का निर्देश
आदेश में तहसीलदार डोडा को पुलिस सहायता के साथ 30 दिन के भीतर आदेश को लागू करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही कहा गया कि जबरदस्ती कार्रवाई से पहले प्रतिवादियों को नोटिस और उचित अवसर दिया जाए। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल वरिष्ठ नागरिक को वैधानिक संरक्षण और उसकी स्व-अर्जित संपत्ति से बेदखली तक सीमित है।
यह किसी भी पक्ष के किसी स्वतंत्र दावे या बचाव पर अंतिम निर्णय नहीं होगा। वकील बंडे ने इसे ऐतिहासिक फैसला बताते हुए कहा कि यह सिद्ध करता है कि वरिष्ठ नागरिक अपने ही घर में असुरक्षित नहीं छोड़े जा सकते।
