दीपावली पर घर तो जगमगाएंगे, पर इनकी कमाई कैसे होगी? जम्मू के कुम्हारों ने बयां किया दर्द
दीपावली नजदीक आते ही बिश्नाह के कुम्हार मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हैं, लेकिन बिजली की लड़ियों के बढ़ते ...और पढ़ें

दीपावली पर मिट्टी के दीयों की घटती मांग, कुम्हारों के लिए चुनौती। (फाइल फोटो)
HighLights
दीपावली पर कुम्हारों की मेहनत, दीयों की मांग घटी।
बिजली की लड़ियों से पारंपरिक दीयों की बिक्री प्रभावित।
स्थानीय कुम्हारों को सहारा दें, परंपरा बचाएं।
सतीश शर्मा, बिश्नाह। दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। कहीं रंग-बिरंगी बिजली की लड़ियां सज रही हैं तो कहीं आकर्षक सजावटी लाइटों से दुकानें सजी हुई हैं। इन सबके बीच मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार भी अपने पुश्तैनी काम में जुटे हैं। दिन-रात मेहनत कर वे मिट्टी को आकार देकर दीपक तैयार कर रहे हैं, लेकिन बदलते समय के साथ पारंपरिक दीयों की घटती मांग ने उनके चेहरों पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
दीपावली के लिए मिट्टी के दीये तैयार कर रहे बिश्नाह वार्ड नंबर 12 कुम्हार पादू राम ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि पहले त्योहार के दिनों में मिट्टी के दीयों की अच्छी मांग रहती थी।
लोग घरों और मंदिरों को रोशन करने के लिए बड़ी संख्या में दीये खरीदते थे, लेकिन अब बिजली की लड़ियों और तरह-तरह की सजावटी लाइटों के बढ़ते चलन के कारण पारंपरिक दीयों के खरीदार कम होते जा रहे हैं। इससे कुम्हारों की मेहनत के अनुरूप कमाई नहीं हो पाती।
कई दिनों की मेहनत के बाद तैयार होते हैं मिट्टी के दीये
उन्होंने कहा कि मिट्टी के दीये बनाना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए मिट्टी जुटाने, उसे तैयार करने, चाक पर आकार देने, सुखाने और पकाने तक काफी मेहनत करनी पड़ती है। कई दिनों की मेहनत के बाद दीये तैयार होते हैं।
इसके बावजूद यदि बाजार में बिक्री अच्छी न हो तो लागत और मेहनत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में पुश्तैनी मिट्टी के बर्तन बनाने के काम से जुड़े परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो रहा है।
मिट्टी के दीये केवल सामान नहीं, हमारी संस्कृति की पहचान
पादू राम का कहना है कि दीपावली केवल घरों को सजाने का त्योहार नहीं, बल्कि हमारी आस्था, परंपरा और संस्कृति से जुड़ा पर्व है। सनातन परंपरा में इस दिन मिट्टी के दीपक जलाने का विशेष महत्व है। दीयों की रोशनी घर-आंगन को प्रकाशमय करने के साथ त्योहार की पारंपरिक पहचान को भी जीवंत रखती है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि वे दीपावली पर बिजली की लड़ियों के साथ मिट्टी के दीये खरीदना और जलाना भी न भूलें। स्थानीय कुम्हारों से दीये खरीदने से न केवल उनकी आर्थिक मदद होगी, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही इस पारंपरिक कला को भी संरक्षण मिलेगा। हमारी नई पीढ़ी वैसे भी इस काम से दूरी बना रहीं है हमे डर हैं कही यह परंपरा समाप्त हो जायेगी।
दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदकर बढ़ाएं कुम्हारों का हौसला
आज जरूरत इस बात की है कि लोग त्योहार की चमक-दमक के बीच उन हाथों की मेहनत को भी याद रखें, जो दीपावली के लिए मिट्टी के दीपक तैयार करते हैं। यदि हर परिवार अपनी क्षमता के अनुसार कुछ मिट्टी के दीये खरीदकर जलाए, तो इससे स्थानीय कुम्हारों को सहारा मिल सकता है।
दीपावली पर घरों में मिट्टी के दीपक जलाना केवल एक परंपरा निभाना नहीं, बल्कि अपने स्थानीय कारीगरों के श्रम का सम्मान करना भी है। कुम्हारों की उम्मीद अब लोगों से जुड़ी है कि इस बार दीपावली पर मिट्टी के दीयों को भी उतना ही स्थान मिलेगा, जितना रंग-बिरंगी रोशनी को मिलता है।
आखिर मिट्टी के दीयों से जगमगाते घर ही हमारी परंपरा और संस्कृति की असली पहचान हैं। फोटो सहित दिवाली नजदीक आते ही बिश्नाह वार्ड नंबर 12 में मट्टी के दीपक तैयार करता कुम्हार पांडु राम
