श्रीनगर, राज्य ब्यूरो। राज्य हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 में घाटी में कानून व्यवस्था की स्थिति में मारे अथवा जख्मी हुए नागरिकों के साथ न्याय करने व दोषी अधिकारियों को दंडित करने के लिए दायर याचिका पर अपना फैसला आरक्षित कर लिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार के वकील को कौल आयोग की पूरी रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में एक सप्ताह के भीतर अदाल में जमा कराने को कहा है।

याचिकाकर्ता पीपुल्स फोरम के वकील एडवोकेट शफकत नजीर ने मामले में अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि कौल आयोग की सभी सिफारिशों को अदालत में पेश नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि पीडि़तों और उनके परिजनों के हितों को ध्यान में रखते हुए कौल आयोग की सिफारिशों को जल्द लागू कर न्याय यकीनी बनाया जा सकता है।

वहीं राज्य सरकार के कौंसिल ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि सुरक्षा कारणों से कौल आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। उन्होंने अदालत को बताया कि वर्ष 2010 की हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों और जख्मी हुए लोगों की बेहतरी के लिए कई कदम उठाए गए हैं।

भारत सरकार ने प्रत्येक मृतक के परिवार के लिए पांच लाख रुपये का मुआवजा तय किया है। जस्टिस अली मोहम्मद मागरे और जस्टिस संजीव कुमार की डिवीजन बैंच ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना आदेश आरक्षित रखा।

गौरतलब है कि वर्ष 2010 में वादी में हुए हिंसक प्रदर्शनों में कथित तौर पर 120 ज्यादा लोग मारे गए थे।

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