श्रीनगर, राज्य ब्यूरो। अनुच्छेद 370 को समाप्त कर जम्मू कश्मीर के भारत में अधिमिलन को पूर्ण मिलन बनाने के बाद केंद्र व राज्य प्रशासन के सामने अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं, जिनसे पार पाना है। आतंकवाद, अलगाववाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, विकास, कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास, स्थानीय युवाओं को पाकिस्तान व जिहादी तत्वों के दुष्प्रचार से बचाना, जम्मू व कश्मीर में प्रशासनिक तालमेल और जम्मू को कश्मीर के बराबर राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना बड़ी चुनौती होगा।

प्रशासनिक स्वरूप में तालमेल बैठाना :

जम्मू कश्मीर का संविधान अब प्रभावी नहीं रहेगा। भारतीय संविधान और इंडियन पैनल कोड ही लागू होगा। विधानसभा तो पहले ही भंग थी, अब विधान परिषद भी नहीं रहेगी। केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में विधानसभा को किस तरह से गठित किया जाए, किस तरह से जम्मू और कश्मीर प्रांत में राजनीतिक संतुलन को बरकरार रखा जाएगा। नए कानून कैसे और किस तरह से लागू किए जाएंगे। प्रशासनिक स्वरूप क्या होगा, नौकरशाही में विभागों का बंटवारा, वित्तीय संसाधनों का बंटवारा, यह सब आसान नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर पदों का पुनर्गठन और उन्हें दोबारा परिभाषित करने की भी जरूरत होगी। इस दौरान कई मौजूदा अधिकारियों का कद घटेगा। राज्य लोक सेवा आयोग के तहत नियुक्त अधिकारियों, कश्मीर प्रशासनिक सेवा और कश्मीर पुलिस सेवा के अधिकारियों को कैसे समायोजित किया जाएगा। यह भी केंद्र शासित जम्मू कश्मीर के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

जम्मू को कश्मीरी राजनीतिक वर्चस्व से छुटकारा :

जम्मू प्रांत के लोगों की हमेशा कश्मीरी राजनीतिक वर्चस्व से छुटकारे की मांग रही है। केंद्र शासित राज्य में जब विधानसभा होगी तो उसमें जम्मू की यह मांग पूरी करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि परिसीमन के बिना सीटें बढे़ंगी नहीं। शुरू से ही जम्मू से कश्मीर की सीटें अधिक रही हैं। वहीं केंद्र ने एक कानून पारित कर पूरे देश में 2026 तक परिसीमन पर रोक लगा रखी है।

आतंकवाद और अलगाववाद से मुक्ति पानी होगी :

पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (आइपीएस) अशकूर वानी ने कहा कि आतंकवाद और अलगाववाद की चुनौती अनुच्छेद 370 की समाप्ति के साथ समाप्त नहीं होगी। यह बरकरार रहेगी। इस नए प्रशासनिक परिदृश्य में इस पर किस तरह से काबू पाया जाएगा, यह देखना होगा। अब केंद्र ऐसा नहीं कह सकता कि राज्य सरकार सहयोग नहीं कर रही है। अब उसका यहां सीधा नियंत्रण रहेगा। पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन होगी। आतंकवाद और अलगाववाद एक विचारधारा के आधार पर पनपता है। आतंकियों व अलगाववादियों के खिलाफ जो रणनीति बनेगी, उसमें अब स्थानीय सियासत आड़े नहीं आएगी। इसलिए अगर अब आतंकवाद यहां रहता है तो वह केंद्र की नाकामी होगी। स्थानीय युवकों को आतंकी बनने से रोकना, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करना, पाकिस्तान के दुष्प्रचार पर रोक लगाना अब उसकी जिम्मेदारी है और उसके लिए सीधी चुनौती है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ :

1.-जम्मू कश्मीर में आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रो. जसबीर सिंह ने कहा कि भ्रष्टाचार और बेरोजगारी यहां बहुत बड़ा मुद्दा है। यह केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में कैसे हल होगा। तर्क दे सकते हैं कि यहां बड़े उद्योग लगेंगे, लेकिन कौन से और जो उद्योग यहां स्थापित होंगे, वह कितनी देर तक टिकेंगे। हमने देखा है कि यहां बहुत से उद्योगपति आए उन्हें यहां सबसिडी और अन्य रियायतें मिलीं, लेकिन एक अर्से तक उन्होंने यहां काम किया और उसके बाद अपना माल समेट चले गए। इसके अलावा हमें यह भी देखना है कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसरों को कैसे यकीनी बनाया जाएगा। सरकारी नौकरियों में जम्मू कश्मीर के लोगों के हितों को यकीनी बनाना कोई छोटी चुनौती नहीं है।

2.-कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ प्रो. हरि ओम ने कहा कि अलगाववाद, आतंकवाद और बेरोजगारी जैसे मुद्दे तो हैं, लेकिन जो सबसे बड़ी चुनौती थी, उसे आज हल कर लिया गया। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद अब आतंकवाद और अलगाववाद जैसे मुद्दों पर केंद्र सीधे फैसले लेगा। स्थानीय सियासत हावी नहीं होगी, जिससे आतंकवाद और अलगाववाद को शह देने वाले तत्व जम्मू कश्मीर से भागेंगे। राष्ट्रवादी तत्व मजबूत होंगे। हां, अब केंद्र शासित राज्य बनने के बाद जम्मू को कश्मीर के बराबर राजनीतिक रूप से कैसे सशक्त बनाया जाएगा, यह देखना होगा।

3.-कश्मीर के एक वरिष्ठ पत्रकार और शायर ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जम्मू कश्मीर में सिर्फ कश्मीरी मुस्लिम ही नहीं जम्मू प्रांत में भी एक बड़ा वर्ग अनुच्छेद 370 को अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, मजहबी पहचान मानता है। यह वे लोग हैं जिन्होंने राज्य में कभी भी अलगाववाद का समर्थन नहीं किया, लेकिन अपनी अलग पहचान को लेकर हमेशा भावुक रहे हैं। इस वर्ग की भावनाएं आहत हुई हैं और उनके जख्म पर केंद्र कैसे मरहम लगाते हुए उन्हें अलगाववादियों और जिहादी तत्वों का शिकार होने से बचाता है, यह सबसे बड़ी चुनौती है।

बड़ी चुनौतियां-1. आतंकवाद 2. अलगाववाद 3. भ्रष्टाचार 4. बेरोजगारी 5. विकास 6. कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास 7. स्थानीय युवाओं को पाकिस्तान व जिहादी तत्वों के दुष्प्रचार से बचाना 8. जम्मू व कश्मीर में प्रशासनिक तालमेल बैठाना 9. जम्मू को कश्मीर के बराबर राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना 10. 370 को अपनी अलग पहचान मानने वाले वर्ग को भावनाओं पर मरहम लगाना

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Posted By: Preeti jha

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