जम्मू, जागरण संवाददाता। कंडी क्षेत्रों में चूंकि पानी की कमी रहती है, मगर इसके बाद भी किसान सूझबूझ से खेती करे तो अच्छा पैसा बना सकते हैं। रबी सीजन में ऐसी कैश क्रॉप पर जा सकते हैं, जो कम पानी में तैयार हो सकती हो और अच्छा मुनाफा कराती हो। ऐसे में चने की खेती एक बेहतर विकल्प कंडी के किसानों के लिए हो सकता है। इसकी खेती का सीजन तकरीबन आ ही गया है। जमीन में नमी बनते ही चने की बिजाई की जा सकती है।

खास बात यह है कि चने की खेती कैश क्राप है जोकि कम पानी वाले क्षेत्रों में भी तैयार हो सकती है और आसानी से बिक जाती है। अगर किसान चने की खेती पर आना चाहते हैं तो उनको भूमि को पहले अच्छी तरह से समतल बनाना होगा और कोशिश की जाए कि देसी या वर्मी कंपोस्ट खाद जमीन में डाली जाए। कृषि विशेषज्ञ सागर शर्मा ने बताया कि अगर कंडी का किसान चने की खेती करता है तो ज्यादा मुनाफा कमा सकता है, लेकिन किसानों को बीज की गुणवत्ता को यकीनी बनाना होगा। इस सीजन में किसान चने के बीज बीजी 372 व जीएनजी 1581 का इस्तेमाल कर सकते हैं। दो कनाल भूमि में खेती करने के लिए किसानों को आठ किलो बीज लगाने की जरूरत रहती है।

जब भी खेती करनी हो तो कतारबद्ध (लेन सोइंग) तरीके से लगाए जाएं तो फायदेमंद होगा। लेन सोइंग खेती के लिए सीड डिल का इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर यह मशीन किसानों के पास उपलब्ध नही है तो हल चलाकर कतारबद्ध तरीके से बिजाई की जानी चाहिए। किसानों को यह ध्यान रखना होगा कि लेन से लेन व पौधे से पौधे की दूरी पर्याप्त हो। पौधे से पौधे की दूरी छह इंच होनी चाहिए, जबकि लेन से लेन की दूरी एक फुट की रहनी चाहिए। लेन सोइंग का लाभ यह है कि दवाओं का छिड़काव करना किसानों के लिए आसान हो जाता है। चने की फसल में अनचाही घास न पनपे, इसके लिए खपतमार दवाओं का छिड़काव किया जाना चाहिए। कंडी क्षेत्र की इस खेती में अगर किसान कड़ी मेहनत करता है तो 75 से 80 किलो चने की पैदावार प्राप्त कर सकता है जबकि नहरी क्षेत्रों में तो पैदावार ज्यादा भी ली जा सकती है।

गेहूं की करें बिजाई : जिन इलाको में जमीन में नमीं है, वहां गेहूं की बिजाई की जा सकती है। कृषि विशेषज्ञ अमरीक सिंह का कहना है कि किसान प्रयास करें कि मध्य नवंबर तक बिजाई का काम पूरा कर लिया जाए। नहीं तो उसके बाद किसानों को लेट वैरायटी के बीजों का सहारा लेना होगा। समय पर की गई बिजाई किसानों को अच्छी पैदावार देगी और वहीं समय पर तैयार भी हो जाएगी। बिजाई के काम में जुटे किसान एक बाद का ख्याल जरूर रखें कि लेन साइंग से बिजाई करना बेहतर होता है। बीजों से पौधे कतार में पनपते हैं और ऐसे में खेती अलग-अलग बेड में हो जाती है कि किसान का बीच से गुजरना आसान हो जाता है। इसका लाभ यह कि किसान आसानी से खाद डाल सकता है व दवाओं का स्प्रे कर सकता है। इसलिए किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि लेन सोइंग में बिजाई करने के लिए सीड डिल का इस्तेमाल करें। बिजाई से पहले बीज को रोग मुक्त किया जाना जरूरी है। एक किलो बीज के लिए दो ग्राम काबरेक्सिन या कार्बेन्डाजिम का इस्तेमाल किया जा सकता है।

मधुमक्खी की पेटियों को शिफ्ट करने का समय

बरसात के बाद जम्मू क्षेत्र में फूलों की एकदम से कमी हो जाती है। इतनी कमी कि मधुमक्खियों की फीडिंग मुश्किल में पड़ जाती है। ऐसे मधुमक्खियों की पेटियों को अन्य राज्य जैसे हरियाणा, राजस्थान की ओर शिफ्ट करना ही पड़ता है। काफी मधुमक्खी पालक बाहरी राज्यों की ओर मधुमक्खियों की पेटियों को ले जा चुके हैं, लेकिन जिन किसानों को जानकारी नहीं है, वे अभी भी जम्मू में ही बैठे हुए हैं। उनको ध्यान देना चाहिए कि अगले डेढ़ माह तक जम्मू में फूलों की जबरदस्त कमी रहेगी। जनवरी माह में जैसे ही सरसों के फूल खिलेंगे, तो यहां पर मधुमक्खियों को रखने से लाभ होगा। तब तक मधुमक्खियों को जम्मू में रखना समझों खर्चा बढ़ाना है। इसलिए अगले डेढ़ माह भर के लिए किसान मधुमक्खियों की पेटियों को अन्य राज्यों की ओर शिफ्ट करें तो बेहतर होगा। इन दिनों राजस्थान व दूसरे राज्यों में सरसों के फूल खिल आए हैं और इससे मधुमक्खियों को बेहतर फीड मिलेगी। वहीं किसानों को भी शहद की प्राप्ति होगी। मधुमक्खी पालन के काम में जुटे व्यापारी इंदू भूषण का कहना है कि अगर मुनाफा कमना है तो मधुमक्खी पालकों को पेटियों के शिफ्ट करने के क्रम को समझना होगा। 15 अक्टूबर से लेकर जनवरी माह के अंत तक जम्मू कश्मीर में फूलों की कमी रहती है। इस समय में बाहरी राज्यों में जाना ही सही कदम होगा। लेकिन जो छोटे मधुमक्खी पालक हैं और बाहरी राज्यों में मधुमक्खियों की पेटियां शिफ्ट नही कर सकते, को मधुमक्खियों को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा। एक पेटी मधुमक्खी की फीडिंग के लिए सप्ताह में एक किलो चीनी का किसानों को बंदोबस्त करना होगा।

 

Posted By: Rahul Sharma

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