जम्मू, राज्य ब्यूरो। राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने शुक्रवार को रोशनी अधिनियम (एक्ट) के तहत हुए घोटाले की जांच एंटी क्रप्शन ब्यूरो (एसीबी) को सौंप दी। राज्यपाल ने ब्यूरो को निर्देश दिए कि मामले को तेजी से हल कर यह सुनिश्चित किया जाए कि अपराधी जल्द पकड़े जाएं।

राज्य में रोशनी एक्ट लागू होने के बाद कुछ प्रभावशाली लोगों और राजनीतिज्ञों पर सरकारी जमीन कब्जाने के आरोप लगे थे। इस एक्ट में घोटाले का पर्दाफाश वर्ष 2014 में हुआ था। कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में 25 हजार करोड़ रुपयों के घोटाले का खुलासा किया था।

जम्मू कश्मीर राज्य भूमि अधिनियम (रोशनी अधिनियम) वर्ष 2001 में पारित हुआ था। इसके बाद तत्कालीन राज्य सरकार को बड़ी संख्या में अनियमितता व धोखाधड़ी की शिकायतें मिलने लगीं। आरोप लगे कि जम्मू और श्रीनगर जिलों में उच्च मूल्य की भूमि धोखाधड़ी से कई ऐसे लोगों ने हासिल कर ली है, जो हकदार नहीं थे। इन रिपोर्टों के आधार पर राज्यपाल सत्सपाल मलिक के निर्देश पर वर्ष 2018 में रोशन अधिनियम को निरस्त कर दिया गया। पिछली रिपोर्ट के आधार पर अब राज्यपाल ने जम्मू और श्रीनगर के सभी मामलों की जांच एंटी क्रप्शन ब्यूरो को सौंप दी।

क्या था रोशनी एक्ट :

वर्ष 2001 में तत्कालीन सरकार ने जम्मू-कश्मीर स्टेट लैंड (जगह पर रहने वालों को मालिकाना हक) अधिनियम को मंजूरी दी। इसे रोशनी अधिनियम का नाम दिया गया, क्योंकि सरकार ने कहा कि सरकारी (नजूल) जमीनों पर रहने वाले लोगों से बाजार के भाव वसूल करके उन्हें जमीनों का मालिकाना अधिकार दिया जाएगा। सरकार ने इससे 25 हजार करोड़ का राजस्व जुटाने का लक्ष्य रखा और यह तय किया गया कि इस राशि से राज्य में बिजली ढांचे को विकसित किया जाएगा। क्योंकि इस राशि से घर-घर तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा था, लिहाजा इसे रोशनी अधिनियम से पहचान मिली।

जनहित याचिका भी हुई थी दायर :

रोशनी एक्ट के खिलाफ हाईकोर्ट में एडवोकेट अंकुर शर्मा ने जनहित याचिका भी दायर की थी। इस पर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने रोशनी एक्ट के तहत आने वाली जमीनों के किसी भी तरह के लेनदेन (खरीद-फरोख्त या ट्रांसफर) पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। जनहित याचिका में इस कानून को चुनौती देते हुए कहा गया कि यह कानून पूरी तरह से अवैध व असंवैधानिक है और राजनेताओं ने अपने चहेतों को खुश करने के लिए ऐसा काला कानून बनाया, जिसमें सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वालों को सलाखों के पीछे डालने के बजाय उन्हें जमीनों का मालिक बनाया गया। आरोप लगाया गया कि सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वालों में से अधिकतर राजनेता व उच्च प्रशासनिक अधिकारी थे।

Posted By: Rahul Sharma

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