श्रीनगर, नवीन नवाज। काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान से गुलाम कश्मीर लौटे जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों में से कईं कश्मीर घाटी का रुख कर सकते हैं। तालिबान के काबुल पर काबिज होने के बाद बीते सप्ताह जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर का भाई मुफ्ती रौऊफ अजहर ने मुल्ला बरादर और तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के पुत्र मुल्ला याकूब से मुलाकात की। मुल्ला याकूब ने आतंकी ट्रेनिंग जैश के कैंप में ही ली है। उल्लेखनीय है कि लश्कर और जैश दोनों संगठन अपनी आका पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के निर्देशानुसार 14 फरवरी 2019 के बाद जम्मू कश्मीर में अपने छद्म संगठनों के नाम पर ही खून खराबे की साजिश को जारी रखे हुए हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काबुल में अपनी सरकार को मान्यता मिलने तक तालिबान बेशक कश्मीर का रुख न करे, लेकिन उससे संबंधित कई अन्य आतंकी संगठन या कई अन्य जिहादी काबुल मिशन को पूरा समझ, कश्मीर की तरफ आने से गुरेज नहीं करेंगे। इसके अलावा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ भी उनका इस्तेमाल एलओसी पर अग्रिम भारतीय चौकियों पर हमले में कर सकती है। अतीत में कई बार गुलाम कश्मीर में बैठे आतंकियों ने अग्रिम इलाकों में भारतीय सैनिकों पर गोलीबारी की है या किसी चौकी पर हमले का प्रयास किया है और जवाबी कार्रवाई पर वह वापस गुलाम कश्मीर भागे हैं।

बीते कुछ दिनों के दौरान गुलाम कश्मीर में लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद के अफगानिस्तान से लौटे कमांडरों की विजयी रैलियां निकली हैं। इन रैलियों की तस्वीरें और वीडियो भी वायरल हुए हैं। इनमें से अधिकांश अब्बासपुर, गढ़ी दुप्पट्टा, सेंसा, मीरपुर कोटली और नीलम घाटी के इलाके में देखे गए हैं। गुलाम कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में भी इन आतंकी कमांडरों की दो रैलियां बीते सप्ताह ही हुई हैं। गिलगित-बाल्तिस्तान और स्कर्दु में भी तालिबानी लड़ाके देखे गए हैं। गुलाम कश्मीर से आने वाली सूचनाओं के मुताबिक, कुछ जिहादी कैंप फिर से आबाद भी हुए हैं।

हालांकि सेना और पुलिस ने पुष्टि नहीं की है, लेकिन बीते माह जम्मू के सुंदरबनी सेक्टर में मारे तीन घुसपैठियों की आयु, उनका पहनावा और उनके पास से बरामद साजो सामान उनके तालिबानी कनेक्शन की तरफ ही संकेत करता है। ये आतंकी कई दिनों तक सुंदरबनी में जंगल में बैठे रहे थे।

जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ एक अहम भूमिका निभा चुके सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक अशकूर वानी के मुताबिक, पाकिस्तान इस समय कश्मीर में आतंंकवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव की स्थिति मे है। वह एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट मे हैं और इसलिए वह अभी नहीं चाहेगा कि तालिबान पाकिस्तान के रास्ते कश्मीर पहुंचे। लेकिन वह यह कभी भी नहीं चाहेगा कि काबुल में तालिबान की जीत से उत्साहित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के जिहादी उसके लिए सिरदर्द को बढ़ाएं। इसलिए वह अपने कबाइली इलाकों में उसके साथ समझाैता करते हुए उसे कश्मीर की तरफ मोड़ भी सकता है।

ऐसे हालात में वह दिखावे के लिए गुलाम कश्मीर में कुछ आतंकी शिविरों पर कार्रवाई करेगा, लेकिन जिहादी कमांडरों को कश्मीर में दाखिल होने के लिए उकसाएगा। ऐसा होने पर वह कहेगा कि इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है, क्येंकि गुलाम कश्मीर जिसे वह आजाद कश्मीर कहता है, में एक खुद मुख्तार हुकूमत है। पाकिस्तानी फौज सिर्फ उसकी सरहद की हिफाजत के लिए है। उन्होंने कहा कि कई बार आपने देखा होगा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा और एलओसी पर आतंकी हमारी चौकियों पर हमला कर वापस भागे हैं। इस तरह की घटनाएं भी आने वाले दिनों में हो सकती हैं। इसलिए हमारी सुरक्षा एजसेंयािें को ज्यादा चाैकस रहने की जरुरत है।

जिहादी मामलों के अध्येता डा अजय चुरुंगु ने कहा कि लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद के तालिबान के साथ रिश्ते जगजाहिर हैं। इन दोनों संगठनों के कई लड़ाके आइएसआइ के इशारे पर ही तालिबान की मदद के लिए अफगानिस्तान गए थे। अब उनका मिशन पूरा हो चुका और गुलाम कश्मीर लौटने पर वह आराम से बैठेंगे, यह दूर की कौड़ी है। उनका इस्तेमाल कश्मीर में ही होगा । तालिबान और जैश-ए-मोहम्मद के रिश्ते जगजाहिर हैं।

अजहर मसूद के लिए मिशन कश्मीर सबसे अहम और तालिबान इसमें उसकी मदद से इंकार नहीं कर सकता। वह अपने लड़ाके उसे देगा। सिर्फ यही नहीं हमें यह भी देखना चाहिए बीते दो वर्षों के दौरान लश्कर व जैश की गतिविधियां मुख्य तौर पर अफगानिस्तान में केंद्रित रही हैं। तालिबान के वहां सत्तासीन होने पर यह दोनों संगठन अपना आतंकी ढांचा वहां पर ले जा सकते हैं। सिर्फ कश्मीर में दाखिल होने के लिए गुलाम कश्मीर में आएंगे और इस पर पाकिस्तान को भी एतराज नहीं होगा।

इस बीच, एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि तालिबान के काबुल कब्जे को लेकर पूरा सुरक्षा तंत्र पूरी तरह सतर्क है। इसलिए जम्मू कश्मीर कश्मीर की पाकिस्तान के साथ सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा और एलओसी पर घुसपैठ रोधी तंत्र की समीक्षा की जा रही है। सभी फील्ड कमांडरों से बीते एक माह के दौरान उनके कार्याधिकार क्षेत्र में एलओसी व अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हुई किसी भी हलचल पर रिपोर्ट भी तलब की गई है।  

Edited By: Vikas Abrol