जागरण संवाददाता, जम्मू : वरिष्ठ साहित्यकार चमन अरोड़ा के कहानी संग्रह 'इक होर अश्वत्थामा' का डोगरी संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में विमोचन किया गया।

चमन अरोड़ा का पहला कहानी संग्रह लोहे दिया फींगरा 1978 में प्रकाशित हुआ था। उन्हें जम्मू-कश्मीर कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी बेस्ट बुक अवार्ड से सम्मानित कर चुकी है। उनका दूसरा कहानी संग्रह कंधा ते किले वर्ष 1989 में प्रकाशित हुआ। वर्ष 1979 में उनका ललित मगोत्रा के साथ नाटक जीने दी कैद लिखा गया। उनकी कई कहानियां दूसरी भाषाओं में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी टेली फिल्म भी प्रसारित हो चुकी है। वह साहित्य अकादमी नई दिल्ली के सलाहकार बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं। दूरदर्शन और रेडियो से निरंतर उनकी कहानियों का प्रसारण होता रहा है।

चमन अरोड़ा ने अपनी यह पुस्तक अपनी धर्म पत्नी स्व. जो¨गद्र कौर लाड़ी को समर्पित की है।

केएल सहगल हाल में आयोजित कार्यक्रम में चमन अरोड़ा ने कहा कि कहानी लिख कर उन्हें संतुष्टि मिलती है। मन हल्का हो जाता है। कार्यक्रम में उन्होंने अपनी लेखनी के अनुभव साझा किये एवं प्रकाशन में सहयोग करने वालों का आभार व्यक्त किया। वरिष्ठ साहित्यकार छत्रपाल ने चमन अरोड़ा की पुस्तक से कहानी जनानका फ्रेम पढ़ कर सुनाई। जिसने उपस्थिति को भावुक किया। छत्रपाल के कहानी पढ़ने के अंदाज ने भी कहानी की छाप छोड़ी।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पंजाबी कहानीकार डॉ. खालिद हुसैन ने चमन अरोड़ा की कहानियों की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका डोगरी साहित्य में सराहनीय योगदान रहा है। उनका हर कहानी संवेदना से भरपूर एवं नई राह दिखाने वाली होती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग लेखक भी धर्मो के खेमे में बंट गए हैं जबकि ऐसा आज तक भारत के किसी भी बुरे से बुरे दौर में नहीं हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डोगरी संस्था के अध्यक्ष प्रो. ललित मगोत्रा ने कहा कि इस कहानी संग्रह से डोगरी साहित्य की क्यारी में एक ऐसा फूल खिला है, जिसने डोगरी साहित्य को समृद्ध किया है। उन्होंने संस्मरणों को ताजा करते हुए कहा कि जिस उनके समय के दोस्तों में साहित्यिक समझ के साथ सचाई कहने की हिम्मत होती थी और लेखक में भी अपनी कमियों और खूबियों को स्वीकारने का हौसला होता था, जो आज की पीढ़ी में नदारद है। मंच संचालन डॉ. निर्मल विनोद ने किया।

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