नई दिल्ली, जेएनएन। हरियाणा के शाहबाद की रहने वाली रानी रामपाल के पिता तांगा चलाते हैं। साधारण परिवार से आने वाली इस भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान ने कई इतिहास रचे हैं। हालांकि, उन्हें मलाल है कि वह 36 साल बाद देश को एशियन गेम्स में स्वर्ण दिलाने में सफल नहीं हो सकीं। वह कहती हैं, हमें कई मौके मिले पर हम उन्हें गोल में बदलने में चूक गए। रानी रामपाल से मनु त्यागी ने खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश 

जापान को हमने एशियन चैंपियन हॉकी टूर्नामेंट में हराया था, लेकिन एशियन गेम्स के फाइनल में हम उससे हार गए?

हम पूरे समर्पण के साथ खेले। हमें 60 मिनट की अवधि में कई अवसर मिले। खिलाड़ियों ने प्रयास भी किया, लेकिन हम चूक गए। हमने मौके गंवाए, जिससे हम रजत को स्वर्ण में नहीं बदल सके। हमने टूर्नामेंट में बहुत सधा हुआ प्रदर्शन किया। फाइनल में हम हार गए, लेकिन मैच से बहुत सीखा। 

पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में और अब एशियन गेम्स में लगातार बेहतर प्रदर्शन, इतिहास भी रचा। इसे किस तरह से देखती हैं?

एक कप्तान होने के नाते जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। पिछले दो साल से हमारी टीम ने खेल की बारीकियों को, प्रतिद्वंद्वी टीमों को और बेहतर तरीके से समझा है, उनसे सीखा है। तभी हमें सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। आगे भी हम और विश्वास के साथ अपना बेहतर प्रदर्शन करते रहेंगे।

मैदान में प्रतिद्वंद्वी टीम से निपटने के लिए क्या रणनीति बनाती हैं?

मैं अपनी टीम से हमेशा यही कहती हूं कि खुद पर विश्वास रखो। टीम में सब मिलकर पूरे समर्पण के साथ खेलो। जब टीम इस भावना के साथ खेलती है तो सफलता मिलती है। 

आप आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से उठकर कामयाबी के शिखर पर पहुंची हैं। सरकार से क्या उम्मीद करती हैं?

हॉकी ही मेरी जिंदगी है। मैं जो कुछ हूं हॉकी से ही हूं। मैंने हॉकी के लिए सबकळ्छ छोड़ दिया। हमेशा भारतीय टीम को जीत दिलाने की कोशिश की। मैं चाहती हूं कि हरियाणा सरकार मुझे नौकरी दे, ताकि मैं अपने परिवार की और मदद कर सकूं।

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Posted By: Lakshya Sharma