चिंतपूर्णी, नीरज पराशर। चिंतपूर्णी क्षेत्र में वन संपदा की हानि के बाद कई वन्य प्राणियों का अस्तित्व भी दाव पर लग चुका है। ऐसे में वन्य प्राणी तो अपना अस्तित्व खो ही रहे हैं, लेकिन उनके संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयास नाकाफी हैं। ऐसे में यह भी लग रहा है कि नई पीढ़ी को पशु-पक्षी व पेड़ पौधे सिर्फ किताबों में ही देखने को मिलेंगे। ऐसा इसलिए भी कि पूर्व के वर्षों में वनों की अग्नि ने भारी तबाही मचाई है। वहीं, क्षेत्र में चोरी-छिपे शिकार खेलने वालों की कोई कमी नहीं है। साथ में लगातार घट रही वन संपदा के कारण भी वन्य प्राणियों को अपना आप बचाना मुश्किल लग रहा है।

दरअसल फायर सीजन में जब जंगल में आग लगती है तो उस वक्त क्षेत्र के जंगलों में पाई जाने वाली कई वन्य प्रजातियों का प्रजनन काल भी होता है। बड़ी संख्या में इन वन्य क्षेत्रों में विचरण करने वाले पक्षी जंगली मुर्गा, तीतर, बटेर, मोर, क्लीज, कोयल और चिड़िया की कई प्रजातियां अंडे देती हैं। वहीं, अन्य प्राणियों में कक्कड़, सांभर, खरगोश, सूअर और तेंदुआ में से कई की प्रजनन क्रिया का यही सीजन भी होता है, लेकिन जंगल की आग के बाद सब कुछ तबाह हो जाता है। इसके अलावा अभी शुरू होने जा रहे सर्दी के मौसम में भी अवैध शिकारियों की बंदूकें इन बेसहारा जानवरों पर तन जाती हैं। वन माफिया ने भी क्षेत्र के जंगलों को नुकसान पहुंचाया है।

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क्षेत्र के जंगलों को आग से बचाने के लिए आम जनता को जागरूक किया जाता है। विभाग की तरफ से विभिन्न गांवों में जागरूकता शिविर भी लगाए जाते हैं। वहीं, शिकार करने और वन माफिया पर भी पूरी नजर रखी जाती है। वन संपदा एक खुले खजाने की तरह होती है, ऐसे में इसकी सुरक्षा हर कोई करे ताकि वन संपदा के साथ वन्य प्राणियों की भी रक्षा की जा सकती है।

-प्यार सिंह, रेंज अधिकारी वन विभाग

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Posted By: Babita kashyap

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