चीनी के दाम में 20 रुपये तक उछाल, आम आदमी सहित हिमाचल के दवा उद्यमी भी चिंतित; एथेनॉल डिमांड ने बिगाड़ा खेल
देश में चीनी की कीमतों में अचानक 20-25 रुपये प्रति किलो की वृद्धि हुई है, जिससे आम आदमी के साथ-साथ ...और पढ़ें

एथेनॉल की डिमांड बढ़ने से चीनी के दाम बढ़ गए हैं। प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
चीनी की कीमतों में अचानक 20-25 रुपये प्रति किलो की वृद्धि।
हिमाचल के बीबीएन फार्मा उद्योग पर उत्पादन लागत का दबाव बढ़ा।
गन्ने का एथेनॉल उत्पादन में उपयोग चीनी मूल्य वृद्धि का कारण।
सुनील शर्मा, सोलन। देश में चीनी की कीमतों में अचानक हुई तेज वृद्धि ने आम आदमी के साथ-साथ उद्योग जगत की चिंता भी बढ़ा दी है। बीते कुछ महीनों में चीनी के दाम करीब 20 से 25 रुपये प्रति किलो तक बढ़ने का दावा दवा उद्यमियों ने किया है। इसका सीधा असर अब एशिया के प्रमुख फार्मा हब बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (बीबीएन) के दवा उद्योग पर भी पड़ने लगा है।
फार्मा उद्यमियों का कहना है कि कई दवाओं और आयुर्वेदिक उत्पादों में चीनी कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल होती है। ऐसे में इसकी कीमतों में अचानक हुई वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ गई है।
इन उत्पादों में होता है चीनी का इस्तेमाल
बीबीएन औद्योगिक क्षेत्र में सिरप, च्यवनप्राश, प्रोटीन पाउडर, नेचुरल जूस, कोल्ड ड्रिंक्स और अन्य उत्पादों के निर्माण में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में चीनी का इस्तेमाल होता है। उद्यमियों के अनुसार, इन उत्पादों की कीमतें पहले से निर्धारित होने के कारण अचानक बढ़ी लागत को उपभोक्ताओं पर डालना आसान नहीं है। वहीं दवाओं की कीमतों में बदलाव की प्रक्रिया भी सामान्य बाजार उत्पादों की तुलना में अलग और अधिक जटिल होती है।
दाम बढ़ने के पीछे एथेनॉल कनेक्शन
दवा उद्यमियों का कहना है कि चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे गन्ने की उपलब्धता, एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का बढ़ता इस्तेमाल और बाजार में स्टॉक को लेकर दबाव जैसे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। यदि कीमतों में यह तेजी आगे भी जारी रहती है तो आने वाले समय में फार्मा समेत चीनी आधारित उत्पाद बनाने वाले अन्य उद्योगों की उत्पादन लागत और बढ़ सकती है।
चीनी के दामों में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी का दावा
दवा उद्यमियों के अनुसार, इससे पहले त्योहारों के दौरान चीनी की कीमतों में एक-दो रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि सामान्य तौर पर देखने को मिलती थी, लेकिन इस बार कुछ ही समय में 20 से 25 रुपये तक की बढ़ोतरी चिंता का विषय है। उनका कहना है कि बाजार में चीनी की उपलब्धता कम होने और कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव से उद्योगों के लिए उत्पादन लागत का अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है। यदि स्थिति पर जल्द नियंत्रण नहीं पाया गया तो आने वाले समय में इसका असर अन्य उपभोक्ता उत्पादों पर भी पड़ सकता है।
चीनी महंगी हुई तो आयुर्वेदिक उत्पादों की लागत बढ़ेगी
डा. उमा शंकर सिंह, अध्यक्ष, बीबीएन आयुर्वेदिक दवा उत्पादन संघ हिमाचल ने कहा कि फार्मा और आयुर्वेदिक उद्योग में अनेक उत्पादों में चीनी का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता है। च्यवनप्राश समेत कई तरह की दवाइयां और सिरप चीनी के इस्तेमाल से तैयार होते हैं। यदि कीमतों में इसी तरह अस्थिरता बनी रही और मौजूदा स्टॉक समाप्त हुआ तो उत्पादन लागत पर सीधा असर पड़ेगा। सरकार को चीनी की कीमतों में अचानक होने वाली वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए, ताकि कारोबारियों को अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
जून में 42, अब 65 रुपये किलो तक पहुंची चीनी
संजय शर्मा, राज्य प्रवक्ता, हिमाचल ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ने कहा कि जून माह में चीनी करीब 42 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। दवा उत्पादन में चीनी का काफी इस्तेमाल होता है। पहले प्लास्टिक, एपीआई और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी ने उद्योगों की परेशानी बढ़ाई और अब चीनी के दामों में अचानक उछाल से लागत का दबाव और बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि पहले चीनी की कीमतों में दो-तीन रुपये तक की वृद्धि होती थी, लेकिन मौजूदा बढ़ोतरी ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सरकार को कीमतों पर नियंत्रण के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। इसका असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर भी पड़ेगा और चीनी से लेकर चीनी आधारित दवाओं तक की लागत बढ़ सकती है।
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