मनमोहन वशिष्ठ, कसौली (सोलन)

बॉलीवुड फिल्मों में जितना कश्मीर को दिखाया गया है, उतना कश्मीरियों को नहीं दिखाया गया जो दुखद है। यह बात मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने पर्यटन नगरी कसौली में शनिवार को आयोजित आठवें खुशवंत सिंह लिटफेस्ट के दूसरे दिन अपने सेशन 60 ईयर्स इन इंडियन सिनेमा विषय पर कही। उन्होंने कहा कि अपनी पहली फिल्म के लिए स्कूल को छोड़ दिया था, हालांकि उसके बाद फिर पढ़ाई जारी की। फिल्मीस्तान यानी भारतीय सिनेमा में 60 वर्षो के फिल्मी इतिहास पर चर्चा के दौरान उन्होंने अपनी कुछ चर्चित फिल्मों को याद किया। इसमें अराधना, मौसम, सुहाग, कश्मीर की कली, तेरे मेरे सपने, हाथी मेरे साथी में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी दी। शर्मिला ने को-एक्टर देवानंद, शांताराम, राजेश खन्ना और शम्मी कपूर के साथ काम के दौरान व्यतीत किए लम्हों को भी याद किया। सेंसर बोर्ड नहीं सीबीएफसी

सेशन के बाद दर्शकों द्वारा पूछे सेंसर बोर्ड की भूमिका के सवाल पर शर्मिला टैगोर ने कहा कि सेंसर बोर्ड वास्तव में है ही नहीं। उसका नाम सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेट (सीबीएफसी) है। वह सात वर्ष तक सेंसर बोर्ड की सदस्य रहीं और कुछ अहम निर्णय लिए थे। उन्होंने बताया कि इस दौरान समलैंगिगता, विशेष क्षेत्र पर आधारित विवादित फिल्मों को अनुमति नहीं दी थी, ताकि वहां किसी भी प्रकार की कानून व्यवस्था न बिगड़े। पाकिस्तान के कलाकारों में भी नहीं प्रतिभा की कमी

शर्मिला टैगोर ने कहा कि पाकिस्तान के कलाकारों में भी प्रतिभा की कमी नहीं है। बॉलीवुड फिल्मों में उनके काम को लेकर महाराष्ट्र में कोई दल अड़ंगा नहीं डाले। यदि उन्हें बॉलीवुड फिल्मों में काम करना है तो उन्हें फिल्में देश के बाहर रिलीज करनी पड़ेंगी। जब वह 13 साल की थीं तो उन्होंने फिल्मों में कदम रखा था। यह वह दौर था जब फिल्मों में महिलाओं के अभिनय के काम को सही नहीं ठहराया जाता था। उन्होंने आलिया भट्ट, दीपिका पादुकोण, कंगना रनौत आदि अभिनेत्रियों के बारे में कहा कि आज वे बॉलीवुड की सफलतम अभिनेत्रियों में शुमार हैं।

Posted By: Jagran

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