शिमला, नवनीत शर्मा। देवभूमि हिमाचल प्रदेश में अतिथि को देव समझने वाले लोगों ने सबका स्वागत किया है। रेल मंत्रियों के स्वागत का भी इतिहास है। प्रो. मधु दंडवते, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, राम विलास पासवान, पवन बंसल और अब पीयूष गोयल भी। जिनके नाम यहां नहीं लिए गए हैं, उन्हें उनके हिस्से के पुष्पगुच्छ, शॉल और वक्त के हिसाब से हरी या लाल टोपी भी दिल्ली में बड़े एहतिराम के साथ भेंट की जाती रही है।

अब तो रेल बजट सामान्य बजट की बोगी में सवार हो गया है। जब रेल बजट अलग होता था, उसे हिमाचल के कान खुल कर सुनते थे, आंखें खुल कर देखती थीं। हर बार आश्वासन, सर्वेक्षण बजट, सर्वे आदि जैसे शब्द आस के सफर को जारी रखते थे। सच यह है कि झूठी आस देने से कही बेहतर है कड़वा लेकिन व्यावहारिक सच बोला जाए। रेलमंत्री पीयूष गोयल ने धर्मशाला में अपनी साफगोई के माध्यम से वर्षों से दौड़ती आ रही वादों की पटरी को वही आकार दे दिया जो उसका है... पठानकोट-जोगेंद्रनगर मार्ग चौड़ा नहीं हो सकता। रफ्तार अवश्य बढ़ेगी और पारदर्शी कोच चलेंगे।

पारदर्शी कोच जब चलेंगे, तब चलेंगे ही, बहरहाल रेल मंत्री पीयूष गोयल के इस पारदर्शी बयान के लिए हिमाचल को उनका आभारी होना चाहिए। यह लाभ का सौदा है ही नहीं। हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियों, यात्रियों का प्रवाह और रेलवे के लाभ का मॉडल देखते हुए यह संभव है ही नहीं। इससे कुछ राजनेता अवश्य असहज हैं।

दरअसल, हिमाचली राजनीति के हर क्षत्रप के पास जनसभाओं में अपेक्षाओं की बौछार से बचने के लिए ये शब्द छाते का काम करते थे... रेल विस्तार... पटरी चौड़ी होगी...रेल मंडी तक जाएगी। हालांकि ऐसी योजना की भी चर्चा थी कि मौजूदा नहीं अपितु नए पठानकोट-जोगेंद्रनगर रेल मार्ग का सर्वेक्षण किया गया है जिस पर खर्च अधिक आया है। उसके बाद रेल मंत्री का उक्त बयान ही आया है। यह किसी को भी दिखता है कि हिमाचल के दो रेलमार्गों में से एक धरोहर बन गया है और दूसरा धरोहर बनने की ओर अग्रसर है। ऐसे में यहां रेलवे निवेश क्यों करे।

भावना के धरातल पर हिमाचल प्रदेश का नौमान शौक के शब्दों में यह कहना बेशक स्वाभाविक है :

 रेल देखी है कभी सीने पे चलने वाली

याद तो होंगे तुझे हाथ हिलाते हुए हम

 ....लेकिन हिमाचल की तकलीफ यह रही है कि इसके सपनों की एक हद रही.. खूंटों से बंधे रहे ख्वाब। गंभीर मांगों पर अगंभीर मांगें भारी पड़ती आई हैं या फिर जो मांगें होनी चाहिए थी, वे सामने ही नहीं आईं। लेह तक रेलवे मार्ग को केंद्र ने हर हाल में सुनना था, सुना भी गया। सर्वेक्षण का कार्य चल रहा है। इसलिए क्योंकि रेल मंत्रालय वहां लाभ या हानि की बात नहीं सोचता जहां रक्षा या सामरिक हित सामने हों। इसे चीन के बरक्स देखें। लेकिन जो परियोजनाएं सियासी बुद्धि विलास का शगल हों...वे अंतत: उसी का शिकार भी हो जाती हैं।

सच तो यह है कि रेल मंत्री हिमाचली अफसरों से इस बात की अपेक्षा करते आ रहे हैं कि वे पुराने रेलमार्गों की राग पुनरावृत्ति की बजाय हिमाचल के शहरों को जाम से बचाने के लिए परियोजनाएं मांगें। बहरहाल, जहां तक दोनों पटरियों पर गति बढ़ाने की बात है, यह भी ऐसा कहने के समान है कि हम तुम्हें नया खिलौना तो लाकर नहीं देंगे लेकिन जो पूरी तरह टूटने की अवस्था में है, उसे रोबोट के साथ जोड़ देंगे। अपने साथ झूठ न बोलिए। ये घाटियां रफ्तार के लिए नहीं हैं। कांगड़ा से दो घंटे में किसी भी बस में पठानकोट पहुंचने वाला साढ़े चार घंटे खिलौना गाड़ी में बैठ कर पठानकोट नहीं जाएगा। पटरियों की हालत ठीक हो, इंजिन दमे का मरीज न हो, डिब्बों में छाता लेकर न बैठना पड़े...इतना ही हो जाए तो इसे यूनेस्को की दहलीज तक ससम्मान पहुंचाया जा सकता है। फुर्सत की रेल में रेलमपेल के लिए जगह न थी, न होगी।

 1926 से बिछना शुरू हुई यह पटरी

1929 में शानन में ब्रिटिश हितों के लिए पूरी हुई थी। बीते दिनों इंग्लैंड के लोगों ने विशेष रेल में यात्रा कर अपने पुरखों की याद ताजा की है। रेलवे को पैसे भी दिए हैं। यही राह पकड़ें और धार्मिक पर्यटन भी जोड़ दिया जाए तो पटरी को पटरी पर लाया जा सकता है। बाकी मुद्दे तो छिनते रहते हैं, मिलते रहते हैं।

वामिक ने यूं ही तो नहीं कहा होगा :

इंकिलाब-ए-दौरां से कुछ तो कहती ही होगी

तेज रेलगाड़ी जब पटरियां बदलती है

हिमाचल के नुकसान

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र ने बीते दिनों दो नुकसान झेले। एक कांगड़े में जीने को सर्वश्रेष्ठ बताने वाले लोक गायक प्रताप चंद शर्मा और दूसरे धौलाधार को हर रूप में देखने, सुनने, पढ़ने और सुनाने वाले डॉ. पीयूष गुलेरी। बात प्रताप चंद की। गीत एक संवेदनशील विधा है और उनमें भी जो अति संवेदनशील हो, लोक के होने-जीने की बात करे, उसे लोकगीत कहते हैं। यह सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिलता है कि किसी का गीत जीते जी लोकगीत बन जाए। इसी सौभाग्य को जीने वाले प्रताप चंद शर्मा 91 वर्ष की आयु में शरीर को छोड़ गए। उधर, डॉ. पीयूष गुलेरी ने एक गंभीर शिक्षक और हिमाचली पहाड़ी के पैरोकार की भूमिका पचास के दशक से निभाई। साहित्य की हर विधा में लिखा और धौलाधार पर विशेष तौर पर लिखा। डॉ. चंद्रधर शर्मा गुलेरी के समग्र साहित्य पर उनकी पुस्तक का दूसरा संस्करण हाल में आया था। उनके परदादा चेतराम और चंद्रधर शर्मा गुलेरी के पिता पंडित शिवराम भाई थे।

 

Posted By: Babita