ताराचंद शर्मा, शिमला

इस गांव को सांसद की गोद में भी विकास की छांव नहीं मिली। यहां चिराग तले अंधेरे वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। प्रदेश की राजधानी शिमला से सटे थड़ी गांव में विकास तो दूर है, लेकिन समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। यह गांव जल के लिए विकल है। ग्रामीण पेयजल के लिए बावड़ियों पर निर्भर हैं। राज्यसभा सांसद रही बिमला कश्यप सूद ने इसे आदर्श ग्राम योजना के लिए चयनित किया। यह योजना भी तस्वीर नहीं बदल पाई है।

दैनिक जागरण ने गोद लिए गांव में सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं, पानी जैसी बुनियादी जरूरतों की पड़ताल की। आधी आबादी महिलाओं का आधा वक्त पानी ढोने में ही जाया होता है। सड़कों के हाल-बेहाल हैं। वर्ष 2014 में इसका चयन सांसद आदर्श ग्राम योजना के लिए हुआ। तीन साल तक विकास के अव्वल हो जाना चाहिए था, लेकिन तस्वीर यह है कि थड़ी गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। सड़कों की हालत खस्ता है, लोग पीने के पानी को तरस रहे हैं। सिचाई योजनाओं के बिना खेत बंजर हैं। सांसद ने पंचायत के सभी क्षेत्रों में स्वच्छता का ख्याल रखते हुए कूड़ादान तो स्थापित करवा दिए, लेकिन उन्हें खाली करने की कोई व्यवस्था नहीं की गई।

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अधूरे विकास की कहानी

थड़ी के सलाना गांव में आज तक सिंचाई योजना नहीं पहुंच पाई है। प्राकृतिक जलस्रोतों को भी शहर का ग्रहण लगा है। शहर में हो रहे निर्माण का मलबा निर्माण कंपनियों द्वारा पंचायत क्षेत्र में फेंका गया है। इससे पेड़-पौधों सहित जलस्रोत सूख गए हैं। सिंचाई तो दूर पीने का पानी भी दूर दूर से ढोकर लाना पड़ रहा है।

शोघी से ककरेट जाने वाली सड़क वैसे तो पक्की की गई है, लेकिन अब यह खड्ड जैसी हो गई है। इसके अलावा सरी से पौघाट तक की सड़क भी कच्ची है। करोल घाट बागी रिहाड़ा सड़क की भी टारिग नहीं हो पाई है।

ग्राम पंचायत भवन से महज 100 मीटर की दूरी पर प्राथमिक पाठशाला शोघी है। इसका भवन जर्जर है। 130 बच्चे इस भवन में पढ़ रहे हैं। स्कूल के मैदान में कोई फेंसिग नहीं की गई है। पुराने भवन की छत से पानी टपकता है। दरवाजे-खिड़कियां टूटे हुए हैं। स्कूल का नया भवन बनाया जा रहा है, जिसको बनते हुए कई वर्ष हो चुके हैं।

शोघी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है, लेकिन यहां पर मूलभूत सुविधाएं मरीजों को नहीं मिल पा रही है। न तो एक्सरे मरीजों के हो पाते हैं और न ही ईसीजी की सुविधा है।

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क्या कहते हैं लोग

ग्राम पंचायत थड़ी के सलाणा गांव में पहले पानी की व्यवस्था ठीक थी, लेकिन कुछ साल से आसपास के क्षेत्र में हो रही मलबे की डंपिग के कारण प्राकृतिक जलस्रोत सूख गए हैं। अब पानी पीने को भी नहीं मिल रहा है।

-संत राम। लोग बेरोजगार हो चुके हैं, खेत कंपनियों को किराये पर देने के लिए मजबूर हैं। सिंचाई योजनाएं नहीं हैं। योजनाएं होती तो युवाओं को रोजगार मिल जाता।

-शुभम ठाकुर। पंचायत को गोद लेने के बाद गांव में कोई खास फर्क नहीं पड़ा। वर्षाशालिकाओं का निर्माण तो हुआ है, बाकी सड़कों की हालत खस्ता है, कूड़ादान लगाए हैं, उन्हें खाली करने वाला कौन है।

-राम कृष्ण। खेतीबाड़ी करते हैं, लेकिन मौसम पर ही निर्भर होती है, बारिश ठीक हो गई तो कुछ कमा लेते हैं, नहीं तो जेब से भी लग जाता है। अपने स्तर पर वर्षा जल संग्रहण टैंक का निर्माण किया है, उसी से सिचाई करते हैं।

-दिनेश। पानी तो पीने के लिए भी नहीं है, बावड़ी से ढोकर पानी लाते हैं, अभी तो गर्मियां शुरू हुई हैं, जब गर्मी बढ़ेगी तो हाल खराब हो जाएगा। एक योजना जो पानी के लिए बनाई गई है उसमें चार दिन बाद पानी आता है।

-तारा।

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Posted By: Jagran