विधि संवाददाता, शिमला : पारिवारिक बंदोबस्त (फैमिली सेटलमेंट) को न तो पंजीकृत करवाने और न किसी स्टांप पेपर पर लिखने की जरूरत है। प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े मामले का निपटारा करते हुए यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली सेटलमेंट यदि पंजीकृत न भी हो तब भी उसमें हिस्सा लेने वाले सभी भागीदार उसके तहत पाबंद माने जाते हैं। मामले के अनुसार अपीलकर्ता रतन चंद व अन्यों द्वारा दीवानी दावा कर प्रतिवादियों को विवादित भूमि पर किसी तरह का निर्माण करने पर पाबंदी लगाने की गुहार लगाई गई थी। वादियों का कहना था कि सभी पक्षकार विवादित भूमि के संयुक्त मालिक हैं और भूमि का बंटवारा नहीं किया गया है। इसके बावजूद प्रतिवादी ऋषिकेश व अन्य ने भूमि के अव्वल हिस्से पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया है। वादियों का आरोप था कि प्रतिवादियों ने ऐसा करते समय उनकी सहमति नहीं ली और कार्य करते जा रहे हैं।

प्रतिवादियों का कहना था कि 13 मई 1958 को विवादित भूमि का पारिवारिक बंदोबस्त हो गया था, जो उनके दादा नरोत्तम ने किया था। निचली अदालतों ने वादियों का दावा खारिज कर दिया। वादियों ने निचली अदालत के फैसलों को हाईकोर्ट में यह कहते हुए चुनौती दी कि पार्टिशन डीड पंजीकृत न होने व उस पर कोई स्टांप न होने के कारण उसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने निचली अदालतों के फैसलों को उचित ठहराते हुए कहा कि पारिवारिक बंदोबस्त को न तो पंजीकृत करने की जरूरत थी और न ही कानून के तहत उस पर किसी स्टांप ड्यूटी की जरूरत थी।

Posted By: Jagran

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