हिमालयी पहाड़ों पर मंडराया बड़ा खतरा! सिर्फ पौधे लगाने से नहीं रुकेगा भूमि क्षरण; वैज्ञानिकों ने बताई नई रणनीति
हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती विकास गतिविधियों और बदलते मौसम के कारण भूमि क्षरण का संकट गहरा रहा है, जिससे भारत में 96.4 मिलियन हेक्टेयर भूमि प्रभावित है।

हिमालय में भूमि क्षरण का बढ़ता संकट।
HighLights
हिमालय में विकास और मौसम से भूमि क्षरण का संकट गहराया
भारत में 96.4 मिलियन हेक्टेयर भूमि क्षरण से प्रभावित है
पौधारोपण संग ड्रेनेज, ढलान स्थिरीकरण, स्थानीय प्रजाति संरक्षण जरूरी
राज्य ब्यूरो, शिमला। हिमालयी पहाड़ों पर विकास की बढ़ती गतिविधियों और बदलते मौसम के बीच भूमि क्षरण (लेंड डिग्रेडेशन) का संकट गहराता जा रहा है। पूरे देश में करीब 96.4 मिलियन हेक्टेयर भूमि भूमि क्षरण एवं मरुस्थलीकरण की चपेट में है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 29 प्रतिशत है।
हिमालय में सड़क निर्माण और ढलानों की कटिंग के साथ तेज वर्षा और प्राकृतिक भूगर्भीय संवेदनशीलता कई क्षेत्रों में ढलानों को अस्थिर बना रही है। ऐसे में क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन में केवल पौधारोपण पर्याप्त नहीं होगा। ड्रेनेज लाइन ट्रीटमेंट, ढलान स्थिरीकरण, मृदा संरक्षण और स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण को भी अनिवार्य रूप से शामिल करना होगा।
क्षरित क्षेत्रों में आक्रामक प्रजातियां स्थानीय वनस्पतियों के पुनर्स्थापन में बाधा बन रही हैं, इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रजातियों का चयन भी जरूरी है। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला की निदेशक डॉ. मनीषा थपलियाल ने कहा कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर भूमि संसाधनों का अत्यधिक क्षरण हो रहा है।
हिमालयी क्षेत्रों में वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, मृदा अपरदन, अनियंत्रित विकास गतिविधियां, वनाग्नि और जलवायु परिवर्तन भूमि क्षरण के प्रमुख कारण हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता और जलधारण क्षमता प्रभावित होने के साथ जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर भी असर पड़ रहा है।
दुनिया में 3.2 अरब लोग प्रभावित
हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान और सेंटर आफ एक्सीलेंस फार सस्टेनेबल लैंड डेवलपमेंट, देहरादून के सहयोग से 16 से 18 सितंबर तक आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में डॉ. थपलियाल ने कहा कि दुनिया में करीब 3.2 अरब लोग भूमि क्षरण से प्रभावित हैं।
भारत ने वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन का लक्ष्य निर्धारित किया है। देश की कुल क्षरित भूमि में वन भूमि की हिस्सेदारी करीब 22 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पुनर्स्थापन की रणनीति को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करना होगा।
सड़क निर्माण से कटे ढलानों पर जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होने से वर्षा के दौरान सतही बहाव बढ़ता है और मिट्टी का क्षरण तेज हो सकता है। इसलिए पौधरोपण के साथ ढलानों को स्थिर करने और जल निकासी तंत्र को दुरुस्त करने पर भी ध्यान देना होगा।
स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी
क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन के लिए देशज प्रजातियों का रोपण, प्राकृतिक पुनर्जनन, मृदा एवं जल संरक्षण, वर्षाजल संचयन, चराई प्रबंधन और वनाग्नि नियंत्रण जैसे उपाय अपनाने पर जोर दिया गया। डॉ. थपलियाल ने कहा कि स्थानीय समुदायों की सहभागिता, वैज्ञानिक भूमि-उपयुक्तता आकलन और दीर्घकालीन निगरानी को पुनर्स्थापन कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा।
संस्थान के वैज्ञानिक प्रयासों और प्रतिभागियों के अनुभवों को एकीकृत कर इस दिशा में गाइडलाइन तैयार की जा सकती है। प्रशिक्षण में वन, कृषि, उद्यान, पशुपालन, लोक निर्माण और जल निगम सहित विभिन्न विभागों के ग्रुप-ए अधिकारियों, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और गैर सरकारी संगठनों के सदस्यों समेत 21 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
