हिमाचल में 7 साल के भीतर 64 हजार बार खिसके पहाड़, इस साल मानसून में अब तक 300 लोगों ने गंवाई जान
हिमाचल प्रदेश में पिछले सात सालों में 64 हजार से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए हैं, जिससे इस मानसून में 300 लोगों की जान गई है।
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हिमाचल में भूस्खलन का खौफनाक मंजर। फाइल फोटो
HighLights
सात सालों में हिमाचल में 64 हजार से अधिक भूस्खलन
इस मानसून में 300 मौतें, 525 लोग घायल हुए
सरकार ला रही पहाड़ों की कटाई पर सख्त ड्राफ्ट पॉलिसी
राज्य ब्यूरो, शिमला। देवभूमि हिमाचल के पहाड़ लगातार दरक रहे हैं और यह दरारें अब खौफनाक रूप ले चुकी हैं। तबाही का मंजर ऐसा है कि बीते सात सालों में राज्य में 64 हजार से ज्यादा भूस्खलन (लैंडस्लाइड) के मामले सामने आ चुके हैं। यह कोई अनुमान नहीं, बल्कि सैटेलाइट डेटा से सामने आई डराने वाली हकीकत है।
इस साल मानसून सीजन में अब तक करीब 300 लोगों की अकाल मौत हो चुकी है, जबकि 525 लोग घायल हुए हैं। पहाड़ों की इस दरकती छाती और पर्यावरण को बचाने के लिए अब राज्य सरकार हिल कटिंग (पहाड़ों की कटाई) पर एक सख्त ड्राफ्ट पॉलिसी लेकर आ रही है।
अंधाधुंध निर्माण और पहाड़ों के सीने पर चलने वाली मशीनों पर लगाम कसने की तैयारी हो चुकी है। राज्य सरकार ने हिल कटिंग पॉलिसी का एक ड्राफ्ट तैयार किया है, जिसका फिलहाल विधि विभाग (लॉ डिपार्टमेंट) में कानूनी रिव्यू चल रहा है।राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के निदेशक व विशेष सचिव डॉ. पुष्पेंद्र राणा ने बताया कि सेंटिनेल-2 सेटेलाइट डेटा के विश्लेषण से चौंकाने वाले तथ्य मिले हैं।
2018 से 2025 के बीच हिमाचल के लैंडस्केप में लगभग 64 हजार बड़े लैंडस्लाइड दर्ज किए गए। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि अकेले साल 2025 की आपदाओं में करीब 4600 लैंडस्लाइड के मामले सामने आए। इस मौजूदा मानसून सीजन में भी अब तक 36 बड़े भूस्खलन नोटिस किए जा चुके हैं। चंबा, लाहौल और कांगड़ा जैसे जिलों में सबसे ज्यादा तबाही देखने को मिली है।
सिर्फ बारिश नहीं है तबाही का ट्रिगर
अक्सर भूस्खलन के लिए भारी बारिश को दोष दिया जाता है, लेकिन डॉ. पुष्पेंद्र राणा ने स्पष्ट किया कि इसके पीछे और भी कई कारण हैं। हिमालयी भू-भाग की प्राकृतिक नाजुकता (फ्रैजिलिटी) और लगातार हो रही बादल फटने (क्लाउडबर्स्ट) की घटनाएं भी भूस्खलन का बड़ा कारण बन रही हैं। इन हादसों में न सिर्फ इंसानी जानें जा रही हैं, बल्कि मकानों, गोशालाओं और मवेशियों को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है।
प्रस्तावित नीति के मुख्य बिंदु
विकास कार्यों के लिए कम से कम पहाड़ी काटी जाएगी। निर्माण कार्य प्राकृतिक हिल प्रोफाइल के अनुसार ही होगा। पानी की निकासी (ड्रेनेज) को अवरुद्ध नहीं किया जाएगा। खुदाई से निकलने वाले मलबे (एक्सकैवेटेड मटेरियल) को डंप करने के कड़े नियम होंगे। लापरवाही बरतने पर अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय की जाएगी, ताकि विकास भी हो और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।
सुप्रीम कोर्ट की भी है पैनी नजर
हिमाचल में विकास और पर्यावरण के बीच बिगड़ते संतुलन पर सुप्रीम कोर्ट भी गंभीर है। सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने हाल ही में धर्मशाला का दौरा किया है और विभिन्न विभागों से डेटा तलब किया है, जो उन्हें मुहैया करवाया जा रहा है। जल्द ही यह कमेटी शिमला का भी दौरा करेगी और हिमाचल के हालात पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करेगी।
