नवनीत शर्मा

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर कुलदीप सिंह राठौर की ताजपोशी से केवल कुलदीप सिंह को ही ठौर नहीं मिला, बल्कि कांग्रेस भी नए दौर में पहुंच गई है। जातीय, क्षेत्रीय या खेमों के बीच संतुलन साधे जाने की इस कवायद के भीतर एक संदेश भी है। संगठन से जुड़े व्यक्ति को मौका देने का। यानी प्रवक्ता के रूप में जो वकील पार्टी की दलीलें रखता रहा, उसकी अपनी याचिका हालात की अदालत में अब जाकर सफल हुई है। राठौर चुनावी राजनीति में नहीं हैं, इसलिए भी सभी ध्रुवों को सूट करते हैं।

सुखविंदर सिंह के कार्यकाल का आलम यह है कि उनके नाम कोई बड़ी चुनावी उपलब्धि दर्ज नहीं हो पाई। अब अगर वीरभद्र सिंह भी कुलदीप सिंह राठौर के नाम पर राजी हुए हैं तो यह बानगी गौरतलब है। अब वीरभद्र सिंह मैदान में भी उतरेंगे और प्रचार भी करेंगे।

बेशक सुखविंदर सिंह सुक्खू छह साल पूरे कर चुके थे लेकिन वीरभद्र सिंह भी कई बार खुलकर सुक्खू को हटाने की मांग कर चुके थे। राहुल गांधी को यह फैसला लेना था लेकिन जाहिर है, यह निर्णय मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव की गहमागहमी से अधिक जरूरी नहीं था।

वीरभद्र सिंह का आरोप यह भी रहता था कि सुक्खू के कार्यकाल में संगठन जमीन पर नहीं उतरा। पार्टी मैदान तक नहीं गई, केवल कलाकक्षीय बैठकें हुई। आलम यह था कि विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता के रूप में मुकेश अग्निहोत्री तो मुखर रहते थे लेकिन बाहर संगठन के कई चेहरे दिखते थे। दो तो बेहद साफ दिखते थे। संगठन में कई स्थानों पर समांतर नियुक्तियां भी होती रहीं। उससे पूर्व चुनाव में भी हाथ के नसीब में कलह की रेखाएं उभरती रहीं।

अब मामला लोकसभा की चार सीटों का है। वीरभद्र सिंह विरक्त होने का भाव दिखा रहे थे। ऐसे में कुलदीप सिंह राठौर ही ऐसा नाम था जिसके लिए वीरभद्र सिंह भी राजी हो ही गए। आनंद शर्मा तो पूरे परिदृश्य में आनंद में हैं ही। मुकेश अग्निहोत्री के साथ भी राठौर के संबंध अच्छे हैं। जातीय समीकरण ये हैं कि नेता प्रतिपक्ष ब्राह्माण हैं तो राजपूत को पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का पद दिया गया है। क्षेत्रीय समीकरण ये हैं कि सुक्खू के होते नेता प्रतिपक्ष और पार्टी प्रदेशाध्यक्ष दोनों हिमाचल के एक हिस्से से ही नहीं बल्कि एक ही संसदीय क्षेत्र से संबद्ध थे। अब पार्टी का नेतृत्व शिमला को मिला है।

एनएसयूआइ को नेतृत्व देने के बाद कांग्रेस में डेढ़ दशक तक महासचिव रहे कुलदीप राठौर को संगठन की कमान मिली है। अब ऐसी कांग्रेस की उम्मीद की जा रही है जिसमें वीरभद्र सिंह, आनंद शर्मा, मुकेश अग्निहोत्री जैसे नेता एक स्थान पर दिखेंगे। रही बात कुलदीप सिंह राठौर की तो उनके पास अब वक्त है यह दिखाने का कि वह कुशल प्रवक्ता या बुद्धिजीवी ही नहीं, संगठक और कर्ता भी हैं। उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता कांग्रेस को एक करने की होनी चाहिए और संभवत: वह इस तथ्य से परिचित हैं। इधर, कांग्रेस के बड़े नेता संकेत दे रहे हैं कि सुक्खू का राजनीतिक पुनर्वास किया जाएगा।

Posted By: Jagran

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