शिमला, राज्य ब्यूरो। ब्रेकल विवाद पर पूर्व कांग्रेस सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती है। विदेशी कंपनी पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार की मेहरबानी सवालों के घेरे में है। इस संबंध में विजिलेंस जल्द हरकत में आएगी। पूर्व एडीजीपी डॉ. अतुल वर्मा के कार्यकाल में सरकार के निर्देश के बावजूद एफआइआर दर्ज नहीं हो पाई थी। विजिलेंस के मुखिया बदलने के बाद सरकार को उम्मीद है कि अब विदेशी कंपनी पर शिकंजा कसेगा।

सूत्रों के अनुसार नए एडीजीपी अनुराग गर्ग इस मामले की कानूनी बारीकियों का अध्ययन कर रहे हैं। सरकार इस बात से नाराज थी कि जांच एजेंसी भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने में तेजी नहीं दिखा रही। अब कंपनी के बारे में पुख्ता सूचना एकत्र की जा रही है। इसके कर्ताधर्ताओं को पूछताछ के लिए तलब किया जा सकता है। इससे जुड़े दस्तावेजों को खंगाला जा रहा है। लेकिन इसमें कानूनी अड़चनें भी कम नहीं होगी।  

सरकार ने दी अनुमति प्रदेश भाजपा सरकार ने मामले से जुड़े दस्तावेजों का पहले खुद अध्ययन किया। इसके बाद गृह विभाग ने विजिलेंस को एफआरआर दर्ज करने के आदेश दिए। इसमें करीब डेढ़ महीने का वक्त हो गया है।

क्या हैं आरोप

12 वर्ष पहले 2006 में किन्नौर में जंगी थोपन पोवारी पावर प्रोजेक्ट ब्रेकल कंपनी को आवंटित किया था। आरोप है कि इसने अदानी के साथ साझेदारी की। अदानी ने 289 करोड़ का अपफ्रंट मनी भी जमा नहीं किया। यह विवाद सुप्रीमकोर्ट तक पहुंचा। रिलायंस भी इस प्रोजेक्ट को लेने का इच्छुक था।

कब आवंटित किया प्रोजेक्ट

अब यह प्रोजेक्ट 960 मेगावाट की जगह 780 मेगावाट का होगा। इसे हाल ही में सतलुज विद्युत निगम को देने का फैसला हुआ है। 2006 में इस परियोजना को तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने हॉलैंड की कंपनी ब्रेकल कारपोरेशन को देने का फैसला लिया था। ब्रेकल कंपनी निर्धारित अवधि के तहत अपफ्रंट मनी जमा नहीं करवा पाई थी। इस प्रोजेक्ट को हासिल करने के लिए बोली में दूसरे स्थान पर रही देश के शीर्ष उद्योगपति अंबानी की रिलायंस इंफ्र ास्ट्रक्चर ने एतराज जता दिया कि ब्रेकल अपफ्रंट मनी जमा नहीं करा पा रही है इसलिए इसे रिलायंस को आवंटित किया जाए।

क्या हुआ आगे

मामला हाईकोर्ट में भी चला गया। आखिर में ब्रेकल कॉरपोरशन ने अपफ्रंट मनी के 280 करोड़ रुपये जमा करा दिए। इसके बाद अदानी समूह की कंपनी ने भी दावा किया कि यह 280 करोड़ रुपये उसने जमा कराया था। अदानी समूह इस रकम को वापस माग रहा हैं। रिलायंस की याचिका का निपटारा करते हुए सात अक्टूबर 2009 को प्रदेश हाईकोर्ट ने इस परियोजना के ब्रेकल को आवंटन को रद कर दिया था। उस समय धूमल सरकार ने इस परियोजना को रिलायंस को आवंटित करने की बजाय दोबारा बोली लगाई। इस पर ब्रेकल व रिलायंस दोनों ने प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी।