'पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली मनमानी बर्दाश्त नहीं', हिमाचल हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने डलहौजी के प्रतिबंधित क्षेत्र में आवासीय भूखंड को व्यावसायिक उपयोग में बदलने की सरकारी मंजूरी ...और पढ़ें
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हिमाचल हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
HighLights
हिमाचल हाई कोर्ट ने डलहौजी भूखंड रूपांतरण की सरकारी मंजूरी रद्द की
पर्यावरण संरक्षण को संवैधानिक कर्तव्य बताया, मनमानी मंजूरी को अवैध ठहराया
बकरोटा में आवासीय से व्यावसायिक उपयोग पर रोक, जनहित याचिका पर फैसला
विधि संवाददाता, शिमला। कोर्ट निर्णय नेगी की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जीएस संघावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र डलहौजी प्लानिंग एरिया के प्रतिबंधित क्षेत्र में रिहायशी भूखंड को व्यावसायिक (होटल और गेस्ट हाउस) में बदलने की सरकार की मंजूरी को रद कर दिया है। कोर्ट ने कहा, पर्यावरण की रक्षा करना कोर्ट का संवैधानिक कर्तव्य है और नियमों को ताक पर रखकर दी किसी भी मनमानी मंजूरी को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
खंडपीठ ने सरकार के उस पुराने फैसले को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अगर किसी इलाके में पहले कोई अवैध या गलत निर्माण हो गया है तो उसकी आड़ में दूसरा व्यक्ति भी गलत काम करने के लिए समानता के अधिकार का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने पाया कि सचिव का आदेश बिना सोचे-विचारे और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज कर जारी किया था, जिसमें कोई जनहित शामिल नहीं था।
कोर्ट ने कहा, हिमाचल में अंधाधुंध निर्माण और बनों की कटाई के कारण प्राकृतिक आपदाएं लगातार गंभीर रूप ले रही हैं। बकरोटा जैसी खूबसूरत और घनी पहाड़ियों पर व्यावसायिक दबाव बढ़ाना पर्यावरण के लिए आत्मघाती होगा
यह है मामला?
यह मामला डलहौजी के बकरोटा उपमहाल का है। यहां जरूरत आधारित आवासीय निर्माण की ही अनुमति है। वर्ष 1993 में एक निजी भूस्वामी ने इस क्षेत्र में करीब 5,594 वर्ग मीटर जमीन खरीदी थी और साल 2017-18 में वहां छह मंजिला आवासीय इमारत बनाने की मंजूरी ली थी। बाद में उन्होंने इस रिहायशी जमीन को होटल /गेस्ट हाउस जैसे व्यावसायिक इस्तेमाल में बदलने के लिए आवेदन कर दिया। तत्कालीन उपायुक्त (चंबा) की अध्यक्षता
वाली समिति ने व्यावसायिक मंजूरी देने से इन्कार कर दिया था। मामला सरकार के प्रधान सचिव (टाउन एंड कंट्री प्लानिंग) के पास अपील में गया तो तीन जनवरी 2020 को आदेश जारी कर व्यावसायिक बदलाव को मंजूरी दे दी। इसके खिलाफ अपर बकरोटा रेजिडेंट्स एसोसिएशन ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी।
