हिमाचल सचिवालय में फाइलों को लेकर नया शब्दयुद्ध, 80 प्रतिशत काम अटक रहा; 15 दिन के बजाय लग रहे 3 महीने
हिमाचल प्रदेश सचिवालय में फाइलों को 'फॉर कंसीडरेशन' भेजने को लेकर नया विवाद छिड़ गया है, जिससे 80% काम अटक ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश के शिमला स्थित सचिवालय का परिसर। जागरण अर्काइव
HighLights
सचिवालय में 'फॉर कंसीडरेशन' बनाम 'फॉर रिकमेंडेशन' पर शब्दयुद्ध।
80 प्रतिशत फाइलें बिना सिफारिश आने से काम अटक रहा है।
अधिकारी जवाबदेही से बचने के लिए 'विचारार्थ' लिखकर भेज रहे हैं।
प्रकाश भारद्वाज, शिमला। हिमाचल प्रदेश सचिवालय में फाइलों को लेकर नया शब्द युद्ध छिड़ गया है। सरकारी विभाग निदेशालयों से फाइलें फॉर कंसीडरेशन (विचारार्थ) लिखकर भेज रहे हैं, जबकि नियम कहते हैं कि फाइल फार रिकमेंडेशन (संस्तुति) के साथ आनी चाहिएं। सामान्य तौर पर 100 में से 80 फाइलें बिना सिफारिश सचिवालय पहुंच रही हैं। राज्य सचिवालय के अधिकारियों का कहना है कि विचार हम क्यों करें, सिफारिश आप लिखकर लाओ।
सब कुछ नियमानुसार फिर भी स्वीकृति की सिफारिश क्यों
हाल ही में उद्योग विभाग के खनन विंग से फाइल सचिवालय पहुंची। सभी दस्तावेज पूरे, सभी औपचारिकताएं थीं, फिर भी नोटिंग के आखिर में लिखा था फॉर कंसीडरेशन। जब सब कुछ नियमों के अनुसार है तो विभाग स्वीकृति की सिफारिश क्यों नहीं कर रहा?
क्या कहते हैं नियम
फिलहाल विभाग को मौखिक चेतावनी देकर कार्यशैली सुधारने को कहा है। नियम 196-197 (बिजनेस रूल्स) कहते हैं कि निदेशालय प्रस्ताव का परीक्षण कर स्पष्ट संस्तुति भेजेगा। सचिवालय नीति-निर्णय लेगा, तथ्य-जांच नहीं करेगा। जब विभाग ही सिफारिश नहीं करेगा तो सचिव स्तर पर बैठा आईएएस अधिकारी किस आधार पर हस्ताक्षर करे?
80 प्रतिशत फाइलें अटक रहीं
सचिवालय सूत्रों के अनुसार, करीब 80 प्रतिशत फाइलें फार कंसीडरेशन लिखकर आ रही हैं। लोक निर्माण, राजस्व, शिक्षा, स्वास्थ्य विभाग, हर जगह यही हाल है। परिणाम यह होता है कि फाइल सचिवालय पहुंचती है, पर निर्णय नहीं होता। फिर बार-बार विभाग का अधिकारी सचिवालय आकर फाइल का प्रारूप समझाता है और दोबारा नोटिंग होती है, 15 दिन का काम तीन माह में होता है।
प्रशासनिक भाषा में दोनों में काफी अंतर
फॉर कंसीडरेशन का मतलब है सर, आप देख लो, आप तय कर लो। इसमें भेजने वाले की कोई जिम्मेदारी नहीं। फॉर रिकमेंडेशन का मतलब है सर, हमने जांच लिया है, नियमानुसार है, स्वीकृत किया जाए। इसमें भेजने वाला अधिकारी जवाबदेही लेता है। अधिकारी फॉर रिकमेंडेशन लिखने से डरते हैं, क्योंकि बाद में ऑडिट या विजिलेंस जांच हुई तो जवाब उन्हें देना पड़ेगा। इसलिए जिम्मेदारी का बोझ सचिवालय पर डाल दिया जाता है।
