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विक्रमादित्य बनाम IAS व IPS अधिकारियों का विवाद पहुंचा दिल्ली, गृह मंत्रालय से कार्रवाई की मांग; रिटायर DIG मंत्री के पक्ष में

By Yadvinder Sharma Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sat, 17 Jan 2026 05:19 PM (IST)Updated: Sat, 17 Jan 2026 05:24 PM (IST)

हिमाचल प्रदेश में लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह और आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के बीच विवाद गहरा गया है। शिमला निवासी कैप्टन ...और पढ़ें

हिमाचल प्रदेश के कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य सिंह।

हिमाचल प्रदेश के कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य सिंह।

HighLights

  1. कैप्टन अतुल शर्मा ने गृह मंत्रालय को लिखा पत्र।

  2. आईपीएस संघ के प्रस्ताव को 'प्रशासनिक विद्रोह' बताया।

  3. संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई की मांग।

राज्य ब्यूरो, शिमला। हिमाचल प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह और आइएएस व आइपीएस अधिकारियों का विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। इस संबंध में अब आइपीएस अधिकारी संघ के खिलाफ शिमला निवासी कैप्टन अतुल शर्मा ने भारत सरकार के गृह मंत्रालय को औपचारिक पत्र भेजकर इसे संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रशासनिक विद्रोह करार देते हुए निर्णायक कार्रवाई की मांग की है।

पत्र में इसे कार्यपालिका के विशेषाधिकार में सीधा हस्तक्षेप बताते हुए सवाल उठाया है कि क्या प्रदेश का शासन सचिवालय से चलेगा या किसी पुलिस मेस के आंतरिक निर्णयों से। इस तरह के प्रस्ताव को न केवल सेवा आचरण का उल्लंघन बताया है, बल्कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार की संवैधानिक सर्वोच्चता को चुनौती देता है।

उधर इंटरनेट मीडिया पर सेवानिवृत्त आइपीएस विनोद धवन ने आइपीएस एसोसिएशन के प्रस्ताव को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान के विरुद्ध करार दिया है। आइपीएस जैसी प्रीमियर सेवा से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह सार्वजनिक मंच पर ऐसे वक्तव्य दे। जो उनकी गरिमा, प्रतिष्ठा और संवैधानिक दायित्वों को कमजोर करे।

प्रशासनिक दबाव और ब्लैकमेलिंग के समान

कैप्टन अतुल शर्मा ने गृह मंत्रालय को लिखे पत्र में कहा कि आइपीएस एसोसिएशन द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से यह संकेत दिया गया है कि अधिकारी यह तय करेंगे कि वे किन मंत्रियों के साथ कार्य करेंगे। आल इंडिया सर्विसेज के अधिकारियों द्वारा संविधान के प्रति ली गई शपथ का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी निजी संगठन के बैनर तले संस्थागत आहत का हवाला देकर आधिकारिक दायित्वों से दूरी बनाना प्रशासनिक दबाव और ब्लैकमेलिंग के समान है।

गंभीर अनुशासनहीनता की प्रविष्टि की जाए

पत्र में यह भी कहा गया है कि अधिकारियों द्वारा मनोबल और क्षेत्रवाद जैसे शब्दों का प्रयोग कर मंत्री स्तरीय निगरानी से बचने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने इसे पुलिस बल (अधिकार प्रतिबंध) अधिनियम, 1966 तथा उसके तहत बने 1967 के नियमों का उल्लंघन बताया। प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले सभी अधिकारियों के सेवा अभिलेख में गंभीर अनुशासनहीनता की प्रविष्टि की जाए।

सेवानिवृत्त डीआईजी ने भी उठाए अधिकारियों पर सवाल

सेवानिवृत्त डीआइजी विनोद धवन ने दो प्रमुख संगठनों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि किसी मंत्री या नागरिक की राय से सहमत या असहमत होना अलग विषय है, लेकिन उस पर असंतुलित और अनुपातहीन प्रतिक्रिया देना, विशेषकर तब जब वह प्रतिक्रिया देश की सर्वोच्च पुलिस सेवा के संगठन की ओर से हो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

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पुलिस व्यवस्था को नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है, जो कि जेलों में बंद व्यक्तियों तक के लिए लागू होता है। उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या आइपीएस एसोसिएशन या उसके पदाधिकारी संविधान या किसी कानून के तहत यह अधिकार रखते हैं कि वे सार्वजनिक रूप से ऐसे बयान दें, जिनसे यह आभास हो कि नागरिकों को दी जाने वाली सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की सेवाएं दबाव या विरोध के रूप में वापस ली जा सकती हैं।