हिमाचल हाई कोर्ट: 'वित्तीय प्रभाव के कारण पदोन्नति लटकाना कर्मचारी के मौलिक अधिकार का हनन', हेडमास्टर के 300 रिक्त पदों पर टिप्पणी
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने हेडमास्टर के 300 खाली पदों पर पदोन्नति न होने पर सरकार की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि वित्तीय कारणों से पदोन्नति रोकना कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ ने कहा कि पदोन्नति पर विचार करना कर्मचारी का अधिकार है, जिसे सरकार अनदेखा नहीं कर सकती। कोर्ट ने डीपीसी की सिफारिशों पर अमल न करने पर भी सवाल उठाए।

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का शिमला स्थित परिसर। जागरण आर्काइव
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने हेडमास्टर के 300 खाली पड़े पदों पर पदोन्नति न करने पर सरकार के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि इतने अधिक पदों का पदोन्नति न होने के कारण खाली रहना, प्रदेश की दयनीय स्थिति को उजागर करता है।
कोर्ट ने कहा कि वित्तीय प्रभाव के कारण अध्यापकों की पदोन्नतियों को लटकाने का प्रयास उनके मौलिक अधिकार का हनन है।
पदोन्नति कर्मचारी का मौलिक अधिकार
न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ ने पदोन्नति से जुड़े मामले की सुनवाई के पश्चात कहा कि पदोन्नति के लिए विचार किया जाना एक कर्मचारी का मौलिक अधिकार है। इस अधिकार का राज्य सरकार पहले तो समय पर डीपीसी नहीं बुलाकर और उसके बाद अनिश्चित काल तक उसकी सिफारिशों को लागू न करके हनन नहीं कर सकती।
कई कर्मचारी पदोन्नति के इंतजार में
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और शायद कई दूसरे लोग जो अपनी पदोन्नति का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। उन्हें पदोन्नत न करने का एकमात्र कारण प्रमोशन के कारण होने वाले वित्तीय असर को बताया जा रहा है, जिसके बारे में कहा गया है कि वह सरकार के स्तर पर विचाराधीन है।
चार महीने बाद भी डीपीसी की सिफारिशों पर अमल नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रथम दृष्टया वित्तीय असर उन पदों पर पदोन्नति देने में बाधा नहीं बन सकता जो स्वीकृत, अनुमोदित, कैडर का हिस्सा हैं और रिक्त पड़े हैं। सरकार की ओर से रिकॉर्ड में रखी गई हिदायत में हेडमास्टर्स के पदों पर पदोन्नति के लिए सालों की देरी के बाद 28.07.2025 को डीपीसी बुलाने संबंधी जानकारी पर कोई आपत्ति नहीं की गई थी। कोर्ट ने कहा कि लगभग चार महीने बीत चुके हैं, फिर भी डीपीसी की सिफारिशों पर अमल नहीं किया जा रहा है।
चयनित अध्यापकों के आदेश ही लंबित
रिकॉर्ड में रखी हिदायत से यह भी पता चलता है कि सिर्फ चयनित अध्यापकों के पोस्टिंग आदेश ही स्वीकृति के लिए लंबित है। कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति को लटकना तर्कसंगत नहीं है क्योंकि इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि आम तौर पर किसी कर्मचारी की पदोन्नति वास्तविक पदोन्नति की तिथि से होती है न कि उस तिथि से जब डीपीसी द्वारा उसका नाम पदोन्नति के लिए अनुशंसित किया गया था या रिक्ति होने की तिथि से।
याचिकाकर्ता अध्यापक को सभी लाभ पाने का हकदार
लेकिन मामले की गम्भीरता को देखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता अध्यापक जिन्हें 29 नवंबर 2025 को सेवानिवृत्त कर दिया गया, को अंतरिम राहत देते हुए आदेश जारी किया कि यदि याचिकाकर्ता की याचिका मंज़ूर हो जाती है, तो वह देय तिथि से पदोन्नति सहित सभी परिणामी लाभ पाने का हकदार होगा।

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