हिमाचल कांग्रेस में फिर छिड़ी खींचतान! राहुल गांधी के दर पर पहुंचे डिप्टी सीएम और मंत्री, उलझी सुक्खू सरकार
हिमाचल कांग्रेस सरकार मिशन-2027 पर ध्यान केंद्रित करने या दिल्ली की आंतरिक राजनीति में उलझने के बड़े सवाल से घिरी है, जबकि चुनाव में सिर्फ 14 महीने बचे हैं।
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शिमला पहुंचे मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू।
HighLights
चुनाव में 14 महीने शेष, सुक्खू सरकार के सामने बड़ी चुनौती
उपमुख्यमंत्री सहित वरिष्ठ मंत्री दिल्ली में, हाईकमान से शक्ति संतुलन
आंतरिक खींचतान से मिशन-2027 की तैयारियों पर पड़ रहा असर
अनिल ठाकुर, शिमला। अब चुनाव को महज 14 महीने का समय बचा है और हिमाचल की कांग्रेस सरकार इस समय एक बड़े राजनीतिक सवाल के बीच घिरी है कि सरकार मिशन-2027 पर ध्यान देगी या दिल्ली की अंदरूनी सियासत ही उसके एजेंडे पर हावी रहेगी?
प्रदेश में चुनावी तैयारियों को धार देने और सरकार के बचे कार्यकाल में बड़े फैसले लेने का समय है, लेकिन सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान ने पार्टी का फोकस बदल दिया है।
उपमुख्यमंत्री समेत कई वरिष्ठ मंत्री पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। कुछ नेताओं के हाईकमान से मिलने की बात सामने आ रही है तो कुछ के खुद दिल्ली पहुंचने की चर्चा है। इससे प्रदेश कांग्रेस और सरकार में सब कुछ सामान्य होने के दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू और प्रदेश कांग्रेस नेतृत्वलगातार गुटबाजी से इनकार करते रहे हैं, लेकिन दिल्ली में पिछले तीन दिनों से चल रही राजनीतिक गतिविधियां अलग कहानी बयां कर रही हैं।
सूत्रों के अनुसार हाईकमान के स्तर पर मान-मनौव्वल से लेकर शक्ति संतुलन साधने की कवायद तक चली है। मंत्रियों ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी से मिलने का समय मांगा है।
वहीं, मुख्यमंत्री से मंत्रियों के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड मांगे जाने की भी चर्चा है। ऐसे में अब निगाह इस बात पर है कि दिल्ली में चल रही बैठकों का नतीजा क्या निकलता है।
साढ़े तीन साल बाद बढ़ी चुनौती
सुक्खू सरकार का कार्यकाल साढ़े तीन साल से अधिक हो चुका है। विधानसभा चुनाव में अब महज 14 महीने का समय बचा है। ऐसे में सरकार के सामने केवल घोषणाओं और गारंटियों को पूरा करने की चुनौती नहीं है, बल्कि जनता के सामने अगले 14 महीनों का स्पष्ट रोडमैप रखने की जरूरत है। सरकार को विकास परियोजनाओं को गति देने के साथ वित्तीय संकट से निपटने के ठोस उपाय करने होंगे।
प्रदेश की आर्थिक स्थिति पहले ही सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। सीमित संसाधनों के बीच वेतन-पेंशन और विकास कार्यों का संतुलन बनाना आसान नहीं है। ऐसे में राजनीतिक खींचतान का लंबा खिंचना सरकार के लिए दोहरी परेशानी पैदा कर सकता है।
अब गारंटी से आगे का हिसाब देना होगा
सरकार के कार्यकाल के अंतिम चरण में जनता अब यह देखेगी कि गारंटियों के अलावा सरकार ने क्या नया किया और अगले 14 महीनों में क्या करने वाली है। वित्तीय संसाधन जुटाने के दावों से आगे बढ़कर बजट का वास्तविक प्रबंध करना होगा। सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल के बिना यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।
हाईकमान के सामने डैमेज कंट्रोल की चुनौती
दिल्ली में नेताओं की सक्रियता ने कांग्रेस हाईकमान के सामने भी चुनौती बढ़ा दी है। चुनाव से पहले सरकार और संगठन को एकजुट रखना जरूरी है। यदि अंदरूनी मतभेद सार्वजनिक होते गए तो इसका सीधा लाभ विपक्ष को मिल सकता है।
पंजाब में चुनाव से ठीक पहले नेतृत्व में बदलाव का प्रयोग कांग्रेस कर चुकी है और उसके राजनीतिक परिणाम पार्टी के सामने हैं। इसलिए हिमाचल में भी हाईकमान किसी विवाद को लंबा खिंचने देने के पक्ष में नहीं होगा।
विपक्ष की दिल्ली पर नजर
मुख्य विपक्षी दल भाजपा फिलहाल पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है। पार्टी की ओर से अभी तक कोई बड़ा आधिकारिक हमला नहीं किया गया है, लेकिन कांग्रेस के भीतर की हलचल भाजपा के लिए राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सुधीर शर्मा इंटरनेट मीडिया पर तंज कस चुके हैं।
अब कांग्रेस के पास समय बहुत कम है। चुनाव में महज 14 महीने बाकी हैं। जनता के बीच जाने से पहले पार्टी को दिल्ली की अंदरूनी सियासत समेटकर सरकार, संगठन और नेताओं को एक मंच पर लाना होगा। क्योंकि इस समय आपसी खींचतान का हर दिन मिशन-2027 की तैयारी पर भारी पड़ सकता है।
