कसौली रेप केस में हरियाणा के पूर्व BJP अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली को हाई कोर्ट से राहत, क्लोजर रिपोर्ट को ठहराया सही
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कसौली रेप केस में हरियाणा के पूर्व भाजपा अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली को बड़ी राहत दी है।

कसौली रेप केस: पूर्व हरियाणा भाजपा अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली को हाई कोर्ट से मिली राहत।
HighLights
हाईकोर्ट ने मोहन लाल बड़ौली को कसौली रेप केस में राहत दी।
पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को अदालत ने सही ठहराया।
मुख्य गवाह के खंडन पर निर्दोष को समन नहीं किया जा सकता।
विधि संवाददाता, शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट से कसौली रेप केस में हरियाणा के पूर्व भाजपा अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को सही ठहराते हुए कहा कि एकतरफा बयानों के आधार पर किसी निर्दोष को समन जारी नहीं किया जा सकता है।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कसौली के एक नामी होटल में हरियाणा बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष से जुड़े कथित सामूहिक दुष्कर्म मामले में पुलिस द्वारा दाखिल कैंसिलेशन (क्लोजर) रिपोर्ट को सही ठहराया है।
अदालत ने पीड़िता (याचिकाकर्ता) की पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए कहा कि केवल शिकायतकर्ता के हलफनामे या बयानों के आधार पर किसी भी आरोपी को समन जारी करना न्यायसंगत नहीं है, खासकर तब जब मुख्य चश्मदीद गवाह ही दावों का खंडन कर रहा हो। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने पीड़िता द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।
पीड़िता ने 13 दिसंबर 2024 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि 3 जुलाई 2023 को कसौली के एक नामी होटल में दो व्यक्तियों (मोहन लाल बड़ौली और रॉकी मित्तल) ने उसे और उसकी सहेली को नशीला पदार्थ पिलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया और वीडियो बना लिया। पुलिस जांच में घटना के कोई साक्ष्य नहीं मिले, जिसके बाद कसौली की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने 8 जनवरी 2026 को पुलिस की कैंसिलेशन रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था।
इस फैसले को पीड़िता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। पीड़िता ने दावा किया था कि घटना उसकी सहेली की मौजूदगी में हुई थी। हालांकि, सहेली ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई और पीड़िता व उसके नियोक्ता ने उसे झूठी गवाही देने के लिए पैसों का लालच दिया था।
कोर्ट ने पाया कि कथित घटना जुलाई 2023 की थी, जबकि एफआईआर दिसंबर 2024 में कराई गई। कोर्ट ने पाया कि इस 18 महीने की देरी का कोई तार्किक कारण नहीं दिया गया। पीड़िता ने मेडिकल ऑफिसर के समक्ष अपनी मेडिकल जांच कराने से साफ इनकार कर दिया था, जिससे दुष्कर्म की पुष्टि के वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं थे।
होटल के किसी भी कर्मचारी या उस दिन ठहरे अन्य मेहमानों ने होटल में किसी भी तरह की चीख-पुकार या असामान्य गतिविधि की बात से पूरी तरह इनकार किया।
अदालत ने कहा कि हालांकि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता के बयानों को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन जब कहानी पूरी तरह से तर्कहीन हो, चश्मदीद गवाह मुकर चुका हो, और एफआईआर प्रतिशोध की भावना से प्रेरित लगे, तो बिना किसी विश्वसनीय साक्ष्य के आरोपियों को अदालत में घसीटना कानूनन गलत होगा।
