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सोशल मीडिया ट्रायल का खौफनाक चेहरा: हर स्क्रीन पर बैठे जज और पत्रकार, बिना सुनवाई के घोंट रहे बेगुनाहों का दम

By Navneet SharmaEdited By: Prince Sharma
Published: Thu, 29 Oct 2026 08:46 AM (IST)

यह लेख सोशल मीडिया पर बिना तथ्यों के होने वाले 'ट्रायल' और डीपफेक के घातक प्रभावों पर प्रकाश डालता है। ...और पढ़ें

फोटो एआई द्वारा जनरेट की गई है।

फोटो एआई द्वारा जनरेट की गई है।


HighLights

  1. सोशल मीडिया पर बिना सुनवाई के फैसले घातक

  2. डीपफेक और एआई से बढ़ रहा मानसिक प्रदूषण

  3. कसौली में युवक की आत्महत्या, धर्मशाला मामला उदाहरण

नवनीत शर्मा, राज्य संपादक। कथित सोशल मीडिया को क्यों नहीं केवल इंटरनेट मीडिया कहा जाना चाहिए...सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सूर्यकांत का कहा यह वाक्य कितना प्रासंगिक है कि हर नागरिक के पत्रकार बनने से समस्या है! एक पंक्ति यह भी जुड़नी चाहिए कि इंटरनेट मीडिया में बैठा हर व्यक्ति केवल पत्रकार ही नहीं, न्यायाधीश भी बन बैठा है।

इस कोढ़ पर खाज डीपफेक और एआई है जिससे कोई भी किसी सैन्य अधिकारी के मुंह में कोई भी शब्द डाल दें और फिर उसे कथित सुशिक्षित लोग भी शेयर कर रहे हैं कि चीन के विरुद्ध अरुणाचल प्रदेश में कार्रवाई से रोका जा रहा है। तर्क, तथ्य, शालीनता, सौम्य विमर्श सबके सब मानसिक प्रदूषण के शिकार बन रहे हैं।

उसका प्रभाव कितना घातक होता है, इसे समझने के लिए केवल दो प्रकरण। एक हाल का, जिसमें, कसौली के होटल में बावर्ची का काम करने वाले एक 31 वर्षीय युवा ने इस बात से आहत हो कर आत्महत्या कर ली कि उसका सैन्य वर्दी पहने हुए फोटो उसे थाने तक ले गया और इंटरनेट मीडिया के जजों ने उसका ट्रायल कर दिया।

दूसरा प्रकरण राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला के एक प्राध्यापक का, जिन्हें एक छात्रा की मृत्यु से जुड़े मामले में जांच से पहले ही इंटरनेट मीडिया के पत्रकारों और जजों ने दोषी करार दे दिया था।

यह तथ्य किसी रोजनामचे में दर्ज नहीं है कि उक्त प्राध्यापक के घर में तीन दिन तक खाना नहीं बना था। यह अलग बात है कि कालांतर में निकला कुछ नहीं। बहरहाल, बात कसौली की। वहां किसी बड़े होटल में खाना बनाने का काम करने वाले अर्पण कटोच की, सैन्य वर्दी पहने हुए कोई फोटो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हुई और कुछ लोगों ने पुलिस को शिकायत दी।

पुलिस ने उसका पता लगाया और उससे पूछताछ की। पता चला कि देशद्रोह या अन्य किसी आपराधिक घटना में उसकी संलिप्तता नहीं है। जब स्थापित हो गया कि वह निर्दोष है तो उसे जाने के लिए कहा गया।

उसे वापस भेजे जाने से पूर्व जांच अधिकारी ने पाया कि उसे मनोवैज्ञानिक परामर्श देना चाहिए। जांच अधिकारी ने लंबी बातचीत में उसे समझाया कि कुछ नहीं है, कई बार गलतफहमी हो जाती है, तुम आराम से नौकरी करो, घर जाना चाहते हो तो घर जाओ।

लेकिन वह इंटरनेट मीडिया पर हुई बदनामी को सह नहीं पाया और उसने जहरीला पदार्थ खाकर जान दे दी। जो सामने दिख रहा है, वह यही है। युवा मूलत: कांगड़ा जिले का था इसलिए जो अभी तक सामने आ रहा है, उससे यह प्रतीत होता है कि उसे सैनिकों की तरह दिखना, सैन्य वर्दी पहनना, सैनिकों की तरह चलना अच्छा लगता था। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यही उसकी मौत का कारण भी बना क्योंकि जिनका इस विषय से कोई लेना देना नहीं था, वे लोग भी पत्रकार और न्यायाधीश की भूमिका में थे।

इस सब में वे आंकड़े खोजने की आवश्यकता नहीं है कि कितने लोग स्मार्ट फोन प्रयोग करते हैं, कितने प्रतिशत को इंटरनेट उपलब्ध है, कितने प्रतिशत कौन से मंच से जुड़े हैं आदि। ये आंकड़े इतने प्रत्यक्ष हैं कि ‘दुनिया मुट्ठी में’ करने का मुहावरा सत्य का सान्निध्य पा रहा है।

सत्य यह भी है कि अफवाह इतने रूपों में आती है कि सत्य उसकी भीड़ में अलग थलग पड़ जाता है। और जब सामने आता है तो हानि बहुत हो चुकी होती है। इंटरनेट मीडिया के उपयोग की लक्ष्म ण रेखा को न लांघने का परामर्श अब ‘उपदेशात्मकता’ के दायरे में आता है।

यह कहना भी ‘प्रवचन’ की श्रेणी में आने लगा है कि मोबाइल या इंटरनेट पर अधिक समय गुजारने से शारीरिक गतिविधि कम होती है, वास्तविक जीवन में संवाद घुट जाता है आदि। सुप्रीम कोर्ट ने तो हालिया आदेशों में कह ही दिया है कि इंटरनेट भी किशोरों के लिए मौलिक अधिकार जैसा है।

बात मौलिक अधिकार तक आ गई है न। इंटरनेट मीडिया के कतिपय अच्छे उदाहरण भी होंगे, वहां अच्छे लोग भी होंगे लेकिन ऐसे उदाहरणों की बारंबारता बढ़ रही है जिनमें अफवाह की सूखी घास के लिए इंटरनेट मीडिया, उसके कथित पत्रकार और कथित न्यायाधीश माचिस की तीली जैसी भूमिका निभा रहे हैं। जिस नैतिक शिक्षा को बचपन से पढ़ाने की बात स्कूलों में हो रही है, उसे इंटरनेट मीडिया के संदर्भ में भी पढ़ाना चाहिए।

जापान जैसे देश में आरंभिक कई वर्षों में यही पढ़ाया जाता है कि जीवन के मूल्य क्या हैं, हमारा व्यवहार क्या हो। लोग एक क्लिक पर लुट रहे हैं, लूट रहे हैं, बर्बाद हो रहे हैं, नैतिकता को खो रहे हैं, भ्रममंडल में जी रहे हैं लेकिन रोक के कदम नगण्य हैं। आचार संहिता है किंतु नहीं है, मोबाइल फोन पर हर विषय पर राय देने का गर्व अवश्य झलकता है लेकिन जिम्मेदारी गायब है।

विषय को समझे बिना, तत्काल न्यायाधीश बन जाने की प्रवृत्ति समाज की सबसे छोटी इकाई मनुष्य से लेकर पूरे देश के लिए खतरनाक है। मौलिक अधिकार तो पहाड़ की तरह चमक रहे हैं किंतु मौलिक कर्तव्य अंधेरी खाई में कराह रहे हैं। और जब जब मौलिक कर्तव्य कराहते हैं, परिवेश हंस सके, यह असंभव होता है।

(लेखक दैनिक जागरण, हिमाचल प्रदेश के संपादक हैं)