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अब जलवायु की मार से फसल का बचाव कर सकेंगे किसान, वैज्ञानिकों ने खोजे निकाला तरीका

Published: Sat, 24 Oct 2026 09:49 AM (IST)

जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों में उभरते नए रोगों और रोगजनकों के व्यवहार पर शिमला में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई।

अब जलवायु की मार से फसल का बचाव कर सकेंगे किसान (जागरण फोटो)

अब जलवायु की मार से फसल का बचाव कर सकेंगे किसान (जागरण फोटो)

HighLights

  1. जलवायु परिवर्तन से फसलों में नए रोग बड़ी चुनौती

  2. रोग पहचान, अनुकूल प्रबंधन, टिकाऊ संरक्षण जरूरी

  3. शिमला संगोष्ठी में वैज्ञानिकों ने दिए नए समाधान

जागरण संवाददाता, शिमला। जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों में उभर रहे नए रोग और बदलते रोगजनकों का व्यवहार कृषि वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

ऐसे में फसल को बीमारी लगने के बाद उपचार करने की अपेक्षा समय रहते रोग की पहचान, जलवायु अनुकूल प्रबंधन और टिकाऊ पादप संरक्षण तकनीकों को अपनाना जरूरी है।

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआइ) शिमला में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में वैज्ञानिकों ने इन चुनौतियों पर व्यापक मंथन किया। हिमालयी क्षेत्र की राजमा की स्थानीय किस्म केआरसी-5 से वैश्विक खोज तक को-18 की यात्रा, अंडों के संदूषण से जुड़े सूक्ष्मजीवों की पहचान एवं प्रबंधन तथा जलवायु अनुकूल कृषि और वानिकी में माइकोराइजा सहजीविता की भूमिका पर भी शोध प्रस्तुत किए गए।

जलवायु अनुकूलन, खाद्य सुरक्षा एवं सतत कृषि के लिए अगली पीढ़ी की पादप स्वास्थ्य रणनीतियां विषय पर आयोजित संगोष्ठी का समापन नवीन शोध और व्यावहारिक कृषि समाधानों को बढ़ावा देने के आह्वान के साथ हुआ।

संगोष्ठी में देशभर के वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, उद्योग प्रतिनिधियों और युवा शोधार्थियों ने भाग लिया। विभिन्न तकनीकी सत्रों में गेहूं के रोगों की मौजूदा स्थिति, उभरती चुनौतियों और प्रबंधन रणनीतियों पर चर्चा हुई।

दूसरे तकनीकी सत्र में जलवायु परिवर्तन से फसलों में उभर रहे रोगों और उनके संभावित नियंत्रण उपायों पर नौ मौखिक शोध प्रस्तुतियां दी गईं। तीसरे, चौथे और पांचवें सत्र में विभिन्न फसलों में रोगों के प्रकोप, रोगजनकों के व्यवहार, उत्पादकता और टिकाऊ रोग प्रबंधन से जुड़े शोध निष्कर्ष साझा किए गए।

प्रेम एन कुमार ने दिए फसल बचाने के पांच सूत्र

एशिया में फंगीसाइड उत्पाद विकास के प्रमुख प्रेम एन कुमार ने आधुनिक फसल सुरक्षा के लिए किसानों और कृषि विशेषज्ञों को पांच सूत्र दिए। बीमारी के बदलते जोखिमों पर तुरंत प्रतिक्रिया दें और पूर्वानुमान के आधार पर बचाव की तैयारी करें।

सही पहचान, तभी सही उपचार जिसमें रोग का स्पष्ट निदान किए बिना दवाओं का इस्तेमाल करने से बचें। एआइ की सलाह को खेत में परखें जिसमें डिजिटल पूर्वानुमान को स्थानीय मौसम, खेत की निगरानी और कृषि विशेषज्ञों की सलाह से सत्यापित करें। फफूंदनाशकों और अन्य नियंत्रण उपायों का वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल करें, ताकि रोगजनकों में प्रतिरोध विकसित होने का खतरा कम हो।

स्थानीय जरूरतों के अनुसार एकीकृत प्रबंधन जिसमें जैविक उत्पादों, कृषि पद्धतियों और जरूरत के अनुसार रासायनिक नियंत्रण को मिलाकर ऐसी रणनीति अपनाएं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था और नियमों के अनुकूल हो।

सेंसर, सैटेलाइट और रोबोटिक्स से बड़ी मात्रा में आंकड़े जुटाए जा रहे हैं, लेकिन उनका उपयोग किसानों के लिए आसान और व्यावहारिक बनाना अभी बड़ी चुनौती है। केवल डेटा जुटाने या एआइ आधारित मॉडल विकसित करने से खेती की समस्याएं हल नहीं होंगी। जरूरी है कि आंकड़ों का विश्लेषण स्थानीय मौसम, खेत की परिस्थितियों और बीमारी के वास्तविक जोखिम के आधार पर हो, ताकि किसान को सही समय पर सही सलाह मिल सके।

उत्कृष्ट शोधकर्ताओं को मिले पुरस्कार

समापन समारोह में डॉ. ऋतु बाला को फेलो पुरस्कार, डॉ. प्रियंका नेगी को सर्वश्रेष्ठ पीएचडी शोध प्रबंध पुरस्कार और शैलजा गुप्ता को एमएससी पुरस्कार प्रदान किया गया।

आइपीएस एनजे नरसिम्हा पुरस्कार अर्शिया पराशर और सुगाशा गौतम को मिला, जबकि एपीएस-आइपीएस यात्रा अनुदान दिनेश कुमार और दीपिका रावत को प्रदान किया गया।पांच मौखिक सत्रों में अंबिका रौतेला, शालिनी वर्मा, डॉ. नीना गुप्ता, डॉ. जगमोहन सिंह, डॉ. हेमंत कंडिले, डा. प्रणीत चहल, डा. विकास मंगल, डॉ. हरप्रीत सिंह, डॉ. के. क्रांति, डॉ. सुभाष, डॉ. नित्या, डा. कैलाश चंद्र नागा, डॉ. सालेज सूद, डॉ. पी लोकेश बाबू और डा. कार्तिक आर. को उत्कृष्ट प्रस्तुतियों के लिए सम्मानित किया गया।पोस्टर पुरस्कारों के लिए भी सम्मानित किया गया।