खबर के पार: [नवनीत शर्मा] : सफाई या स्वच्छता ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ देखने के लिए किसी शब्दकोश की आवश्यकता नहीं है। बेहद सरल और साधारण...फिर यह भी कि ये जीवन के साथ सीधे जुड़े हैं। लेकिन आसान बातें ही प्राय: देर से समझ आती हैं। जॉन एलिया ने यूं ही नहीं कहा था :

कोई मुझ तक पहुंच नहीं सकता

इतना आसान है पता मेरा

स्वच्छता के साथ भी ऐसा ही है। अर्थ इतना आसान है कि कम ही लोग उस तक पहुंच पाते हैं। हिमाचल प्रदेश का एक प्रवेश द्वार है गगरेट। अन्य राज्यों के अलावा मालवा और दोआबा वाले पंजाब के लोग होशियारपुर से चिंतपूर्णी जी की तरफ इसी मार्ग से आते हैं। चोहाल की चढ़ाई चढ़ कर जब खुश्क पहाड़ हरे पहाड़ों का पता दे रहे होते हैं, एक दुर्गंध भी साथ साथ चल रही होती है। सड़क के किनारे पड़े दिखते हैं कथित पुण्य के प्रमाण। जूस के खाली पैकेट, बंदरों को खिलाई जाने वाली ब्रेड के लिफाफे, लंगरों के अधनिपटे साक्ष्य भी साफ दिखते हैं। गंदगी के इस सिलसिले को गगरेट पहुंच कर नगर पंचायत के पुरुषार्थ का बल मिलता है और वह पंजाब-हिमाचल की मुख्य सड़क के किनारे एक विराट ढेर का रूप ले लेता है।

गंदगी का यह क्रम चिंतपूर्णी तक भी जारी रहता है। दिलचस्प यह है कि पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस पूरे क्षेत्र को किसी अभियान की दृष्टि नसीब नहीं होती। स्थानीय प्रतिनिधियों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक के चित्र अपेक्षाकृत पहले से साफ क्षेत्रों से ही आते हैं। यह स्थिति हिमाचल प्रदेश के लगभग सभी शहरों और कस्बों की है। यहां तक कि पंचायत की सफाई की शिकायत भी सड़क किनारे लगे सुलगते हुए कचरे के धुएं में पढ़ी जा सकती है। विज्ञान हो या कोई भी धर्म हो, सभी पक्ष स्वच्छता को अनिवार्य मानते हैं। कोई इसे आधा ईमान कहता है तो कोई इसे स्वस्थ रहने का आसानतरीन जरिया।

लेकिन मानने और करने में ही फर्क ठहरा। आजकल हिमाचल में कुछ कूड़ेदान दिख रहे हैं, जिन पर जनप्रतिनिधियों के नाम अंकित हैं। कई स्थानों पर इनके स्टैंड तोड़ दिए गए हैं, कई स्थानों पर टूट गए हैं। कहीं तो कूड़ेदान शीर्षासन की मुद्रा में हैं। लेकिन जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को छोडि़ए, समाज में ही इनके प्रति सरोकार नहीं दिख रहा। छोटी-छोटी गंदगी, छोटे छोटे उफान अगर समय रहते संभाल लिए जाएं तो वे तूफान नहीं बनते। लेकिन जब मानवीय कदम ही बड़े तूफानों की पटकथा लिख रहे हों तो वे किसी दिन दिखेंगे ही।

दरअसल, सफाई छोटी-छोटी जगहों से शुरू होती है और छोटे-छोटे दिखने वाले दाग साफ न किए जाएं तो वह बड़ी घबराहट का कारण बन जाते हैं। ऐसा ही दिलचस्प मामला सबसे बड़े जिले कांगड़ा में भी सामने आया। सियासत और चुनावी रणनीति के लिहाज से संवेदनशील जिले कांगड़ा में जिला परिषद उपाध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भाजपा लाई और अंतत: कांग्रेस का प्रत्याशी जीत गया। यह वही कांगड़ा है जहां से सरकार में चार मंत्री हैं। कोई रणनीति काम नहीं आई। अभी यह भाजपा के अंदर ही अंदर पक रहा बबाल था। संवादहीनता की काई थी। किसी एक वर्ग विशेष के लोगों को नजरअंदाज किया जाना था...यह कुछ भी था, फजीहत भाजपा की हुई।

कांगड़ा में इस तरह का सियासी परिदृश्य पहली बार नहीं बना इसलिए चौकसी जरूरी थी। विधानसभा में सबसे ज्यादा 15 सीटों वाले त्रिगर्त को जीतना इसलिए जरूरी होता है क्योंकि इसी से शिमला की राह निकलती है। कांग्रेस इसे अपने लिए बड़ी जीत मान रही है। उसकी नजर में यह एक रुझान है। भाजपा के कर्णधार वही कह रहे हैं जो कोई भी इस स्थिति में कहता, 'इसका असर लोकसभा चुनावों पर नहीं होगा। लोकसभा चुनाव में पार्टी और आगे बढ़ेगी।'

दहलीज और आंगन की सफाई किए बगैर पूरे प्रदेश में विरोधियों की चुनावी सफाई का दावा आसानी से गले उतरे न उतरे, इस प्रकरण से सबक जरूर लेना चाहिए। वे कौन लोग थे जो चार मंत्रियों की घेरेबंदी के बावजूद हाथ से फिसल गए? वे क्यों फिसले? क्या कोई अनदेखी का शिकार हो रहा था? यह तो पौंग बांध विस्थापितों जैसा मामला नहीं था कि हिमाचल के नेतृत्व के हाथ राजस्थान का नेतृत्व नहीं आया और विस्थापित पीड़ा सुनाई नहीं जा सकी? यहां तो अपने ही लोग थे जिन्हें सुना जाना था। अभी तो प्रदेश सरकार बने तबीयत से आठ माह भी नहीं हुए। इसे भाजपा को आत्ममंथन के अवसर की तरह लेना चाहिए। जावेद अख्तर ने कहा भी है :

कभी जो ख्वाब था वो पा लिया है

मगर जो रह गई वो चीज क्या थी

अभी तो उस कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक की सफाई भी बाकी है, जहां काफी गंदगी होने के राजनीतिक बयान आए थे। हालांकि अब अदालत ही तय करेगी कि कब, क्या और कैसे होगा। इसी क्रम में समय आ गया है कि बरसात के दिए जख्म भी साफ हों। सड़कें गड्ढों से बाहर आए। जिन की जान चली गई, वे अभागे तो लौटने से रहे, लेकिन हिमाचल स्वच्छ सड़कों पर निर्बाध दौड़े, यह तो प्राथमिकता से करना चाहिए।

Posted By: Munish Kumar Dixit

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