मंडी, हंसराज सैनी। किसानों व वन विभाग के लिए लैंटाना (लाल फुलणू) सिरदर्द नहीं बनेगा। लैंटाना की पत्तियों से जैविक खाद, लकड़ी से ईंधन व सजावटी फर्नीचर बनेगा। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) मंडी को करीब 25.19 लाख रुपये का प्रोजेक्ट सौंपा है।

लैंटाना से हिमालय क्षेत्र के लोगों की आर्थिकी में कैसे सुधार हो सकता है? लैंटाना ग्रामीणों के लिए ईको फ्रेंडली कैसे बन सकता है? आइआइटी मंडी के विशेषज्ञ इसके लिए तकनीक विकसित कर मंत्रालय को सौंपेंगे।

प्रदेश में 1560 वर्ग किलोमीटर वन व निजी भूमि में लैंटाना कैंसर की तरह फैल चुका है। इससे प्रदेश के सात जिले कांगड़ा, बिलासपुर, हमीरपुर, सिरमौर, सोलन, चंबा व मंडी सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इसकी पत्तियां व लकड़ी तेजी से आग पकड़ती हैं। इससे वन संपदा को हर साल बड़ा नुकसान हो रहा है।

लैंटाना से जंगली जीव-जंतु भी प्रभावित हो रहे हैं। फलदार पौधों की संख्या कम हो रही है। पौधारोपण पर असर पड़ रहा है। मवेशियों के लिए हरे चारे की किल्लत हो रही है।

जहां लैंटाना, वहां सब बंजर

यह ऐसी झाड़ी है जो कुछ साल पहले अमेरिका से भारत किसी बीज के साथ पहुंची थी और हिमालय क्षेत्र में जड़ें जमा लीं। एक जगह लगने के बाद इसकी टहनियां तेजी से दूसरे पौधों को चपेट में ले लेती हैं। लैंटाना से छोटे पौधे और घासनियां प्रभावित होती हैं। यह पूरे क्षेत्र को ही बंजर बना देती हैं।

अभी कट रूट सिस्टम का सहारा

फिलहाल, लैंटाना को समाप्त करने के लिए कट रूट सिस्टम तकनीक अपनाई जा रही है। इसकी जड़ को भूमि के अंदर से काटा जाता है। करीब पांच से सात इंच की गहराई से काटने के बाद मिट्टी से ढका जाता है। इसकी टहनियां जमीन पर पड़ी रहें तो भी पौधे का रूप धारण कर लेती हैं।

जानें, किसने क्या कहा

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने आइआइटी मंडी को प्रोजेक्ट सौंपा हैं। पत्तियों से जैविक खाद, लकड़ी से सजावटी फर्नीचर व ईंधन तैयार करने की तकनीक विकसित की जाएगी। इससे लैंटाना का खात्मा होगा, जंगल व निजी भूमि भी सुरक्षित होगी।

-डॉ. आरती कश्यप, एसोसिएट प्रोफेसर, आइआइटी मंडी। 

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लैंटाना के पौधे जड़ से उखाडऩे के सिवाय विभाग के पास कोई चारा नहीं है। इस कार्य में हर साल लाखों रुपये खर्च आता है। लैंटाना के ईको फ्रेंडली उपयोग से समस्या का हल होगा। रोजगार के साधन खुलेंगे और ग्रामीणों की आॢथकी सुदृढ़ होगी।

-पीएल चौहान, अतिरिक्त प्रधान मुख्य अरण्यपाल, वन विभाग। 

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Posted By: Sachin Mishra