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'सरकारी अधिकारियों का व्यवहार तो कोर्ट की तरह', मंडी जिला अदालत ने सुनाया 74,020 रुपये हर्जाना देने का फैसला

By Hansraj Saini Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sun, 29 Mar 2026 06:12 AM (IST)Updated: Sun, 29 Mar 2026 11:04 AM (IST)

मंडी जिला अदालत ने वन विभाग की मनमानी कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने धनी राम को उसकी ...और पढ़ें

मंडी जिला अदालत ने वन विभाग के अधिकारियों पर सख्त टिप्पणी की है। प्रतीकात्मक फोटो

मंडी जिला अदालत ने वन विभाग के अधिकारियों पर सख्त टिप्पणी की है। प्रतीकात्मक फोटो

HighLights

  1. वन विभाग की कार्रवाई को मनमाना और सनक भरा बताया।

  2. धनी राम को ₹74,020 का हर्जाना देने का आदेश।

  3. अधिकारियों ने बिना सबूत कोर्ट की तरह व्यवहार किया।

जागरण संवाददाता, मंडी। हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश कोर्ट एक की अदालत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले में संशोधन किया है। अदालत ने विभाग की कार्रवाई को मनमाना और सनक भरा करार देते हुए अपीलकर्ता धनी राम के पक्ष में 74,020 रुपये का हर्जाना देने का आदेश सुनाया है। इसके साथ ही वाद दायर करने की तिथि से वसूली तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।

क्या था मामला?

मामला साल 2012 का है। बल्ह उपमंडल के बाग गांव का धनी राम अपनी पुश्तैनी भूमि पर घर का निर्माण कर रहा था। 17 जुलाई 2012 को वन विभाग के अधिकारियों (रेंज आफिसर और फारेस्ट गार्ड) ने मौके पर पहुंचकर काम रुकवा दिया। विभाग का तर्क था कि निर्माण वन भूमि पर हो रहा है। अधिकारियों ने न केवल काम बंद करवाया, बल्कि मौके से मिस्त्रियों के औजार (बेलचा, गैंती, कुदाल आदि) भी जब्त कर लिए। धनी राम से कथित नुकसान के बदले 5,000 रुपये वसूले गए, जिसकी रसीद भी काफी देरी से दी गई। 

निशानदेही करवाई तो निजी भूमि पर निकला निर्माण

धनी राम ने इसके बाद राजस्व विभाग से अपनी भूमि की निशानदेही करवाई, जिसमें यह स्पष्ट हो गया कि निर्माण पूरी तरह से उनकी निजी भूमि पर था। इसके बावजूद, विभाग ने उनके औजार फरवरी 2013 तक वापस नहीं किए। 

ट्रायल कोर्ट ने पहले केवल 14,020 रुपये का हर्जाना तय किया था, जिसे धनी राम ने नाकाफी बताते हुए जिला अदालत में चुनौती दी। अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश ने कहा कि वन विभाग ने कानून की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। 

अधिकारियों ने किया कोर्ट की तरह व्यवहार

अदालत ने पाया कि अधिकारियों ने खुद कोर्ट की तरह व्यवहार करते हुए स्टे आर्डर जारी कर दिया, जबकि उन्हें सिविल कोर्ट जाना चाहिए था। बिना किसी ठोस सबूत के एक गरीब व्यक्ति का काम रोकना और औजार जब्त करना मानसिक प्रताड़ना की श्रेणी में आता है। 

अदालत ने सुनाया हर्जाना देने का फैसला

वर्षा के मौसम में काम रुकने से निर्माण सामग्री और मिट्टी बहने से अपीलकर्ता को आर्थिक नुकसान हुआ। अदालत ने पूर्व में निर्धारित राशि को बढ़ाते हुए 74,020 रुपये कर दिया। इसमें अवैध रूप से वसूली गई राशि, जब्त औजारों का हर्जाना, मानसिक प्रताड़ना 35,000 रुपये, मजदूरों की दिहाड़ी और सामग्री का नुकसान 15,000 रुपये तथा कानूनी खर्च 10,000 रुपये शामिल है।

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