मंडी, संवाद सहयोगी। कारगिल युद्ध के दौरान मंडी जिला के जवानों ने जान की बाजी लगाकर देश की सरहद की रक्षा की। 1999 के जून-जुलाई माह में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देश की सीमा से बाहर खदेडऩे के लिए मंडी जिला के ग्यारह वीर जवानों ने अपनी जान की बाजी लगा दी।

 

अपने ग्यारह जवानों की शहादत से मंडी जिला गमगीन हो उठा था। कारगिल युद्ध में देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वालों में रिवालसर हवाणी निवासी सरवण कुमार थे। जो दो जून 1999 को दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हुए। उसी प्रकार इससे अगले दिन ही सुंदरनगर धनोटू निवासी राजेश चौहान तीन जून 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। इसके एक सप्ताह बाद मंडी बल्ह विधानसभा क्षेत्र के स्यांह निवासी टेक सिंह 10 जून को वीरगति को प्राप्त हुए। तीन दिन बाद ही 13 जून को सुंदरनगर के धनेश्वरी के नरेश कुमार भी कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए।

 

उसी प्रकार सरकाघाट उपमंडल के चोलथरा के कैप्टन दीपक गुलेरिया 18 जून 1999 मंडी के पास झाल गांव निवासी हीर्रा ंसह 30 जून को शहीद हुए। जबकि पहली जुलाई 1999 को साईगलू क्षेत्र के टांडू निवासी खेमचंद शहीद हो गए। मंडी शहर के साथ लगते स्हयागला गांव के हवलदार कृष्ण चंद पांच जुलाई पैड़ी के अशोक कुमार आठ जुलाई पंडोह के नजदीक दाडऩ गांव के पूर्ण चंद ने 25 जुलाई और नाचन के दयारगी निवासी गुरदास 31 जुलाई 1999 को देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। उपायुक्त संदीप कदम ने बताया कि प्रशासन शहीदों के परिजनों को हर संभव सहायता प्रदान करने के लिए कृत्संकल्प है। 

 

शहीदों के नाम पर न कारगिल पार्क बना, न ही सड़कें

जिले के कुल 11 जवानों ने कारगिल में शहादत का जाम पीया। इसके बाद सरकार ने मंडी शहर में कारगिल पार्क बनाने की घोषणा की थी, यहां मात्र शहीदों के नाम की पट्टिकाएं हैं। इससे आगे काम नहीं बढ़ पाया है। देश की खातिर बलिदान देने वाले सपूतों की याद में मंडी में 17 वर्ष पहले बनाया गया यह कारगिल शहीद स्मारक अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

 

दो वर्ष से इसके जीर्णोद्धार की योजना बन रही है, लेकिन अभी तक भी यह मुकम्मल नहीं हो सकी है। एक वर्ष पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने मंडी के सेरी मंच पर कारगिल शहीद स्मारक के जीर्णोद्धार और शहीद स्मारक के निर्माण के लिए 50 लाख देने की घोषणा की थी, लेकिन आज तक यह पैसा नहीं आया है। जबकि अब जीर्णोद्धार की डीपीआर भी तैयार हो चुकी है। इससे शहीदों के परिजन अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। सुंदरनगर में शहीद चौक पर महज साइन बोर्ड ही टंगा है।

 

शहीद कैप्टन दीपक गुलेरिया की याद में स्मारक और शहीद कैप्टन दीपक गुलेरिया की स्कूल में प्रतिमा नहीं लग पाई। शहीद पूर्ण चंद के घर तक पहुंचने वाली सड़क अधूरी है। तो रिवालसर में कारगिल शहीद सरवण कुमार के नाम से शिलान्यास के बाद भी 17 वर्षो से शहीद पार्क व स्मारक नहीं बनाया जा सका है। यही नहीं शहीद के गांव को दो किलोमीटर सड़क भी सरकार इन 17 वर्षों में नहीं निकल सकी है।

 

Posted By: Babita Kashyap

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