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पहाड़ों के धंसने से खिसक रही घरों की नींव... हिमाचल के मकानों को भूस्खलन से खतरा, IIT मंडी ने जारी किया एआई मैप

By Hansraj SainiEdited By: Prince Sharma
Published: Fri, 11 Sep 2026 03:24 PM (GMT+05:30)

आईआईटी मंडी के एक वैज्ञानिक अध्ययन ने खुलासा किया है कि हिमाचल प्रदेश में कई भवन भूस्खलन के अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में स्थित हैं।

हिमाचल के मकानों को भूस्खलन से खतरा (फाइल फोटो)

हिमाचल के मकानों को भूस्खलन से खतरा (फाइल फोटो)

HighLights

  1. आईआईटी मंडी के अध्ययन से भूस्खलन का बड़ा खतरा उजागर।

  2. शिमला में 35% से अधिक भवन अति संवेदनशील जोन में।

  3. कुल्लू, मंडी, सोलन में भी बड़ी संख्या में इमारतें असुरक्षित।

हंसराज सैनी, मंडी। जिस घर की छत के नीचे आप सुकून की नींद सो रहे हैं, क्या उसकी नींव सुरक्षित है? हिमाचल के पहाड़ों में अब यह प्रश्न सिर्फ आशंका नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जांच से सामने आई सच्चाई है।

पहाड़ खिसक रहे हैं और उनके साथ घरों की नींव पर भी खतरा बढ़ रहा है। पहली बार एक वैज्ञानिक अध्ययन ने बताया गया है कि कितने भवन सीधे भूस्खलन की जद में हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) मंडी के डेक्सटर लैब के अध्ययन ने हिमाचल के लिए खतरे की घंटी बजाई है।

अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन जियोसाइंसेज में प्रकाशित शोध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) व मशीन लर्निंग की मदद से भूस्खलन संवेदनशीलता के नक्शों को भवनों के वास्तविक आंकड़ों से जोड़ा गया है।

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आइआइटी मंडी के शोधार्थियों द्वारा पहली बार एआइ तकनीक से मापा गया हिमाचल के भवनों पर भूस्खलन का सीधा जोखिमसौ. स्वयं

नतीजा चौंकाने वाला है, शिमला में हर तीन में से एक से अधिक भवन सीधे अति संवेदनशील जोन में है। इस शोध पर आइआइटी मंडी के स्कूल आफ सिविल एंड एनवायरनमेंट इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डॉ. डेरिक्स पी शुक्ला के नेतृत्व में शोधार्थी अंकित सिंह, नितेश धीमान, कीर्ति कुमार महंता ने कार्य किया है।

अध्ययन में रैंडम फारेस्ट, सपोर्ट वेक्टर मशीन व मल्टीलेयर परसेप्ट्रान जैसे एडवांस्ड एआइ माडलों के जरिए भूस्खलन के नक्शों को वास्तविक बुनियादी ढांचे के डाटा के साथ जोड़ा गया है।

राजधानी शिमला में एक-तिहाई से अधिक (35 प्रतिशत) इमारतें भूस्खलन के हाई-रिस्क जोन में हैं। पर्यटन नगरी कुल्लू में 30 प्रतिशत रिहायशी व व्यावसायिक निर्माण कभी भी ध्वस्त हो सकते हैं। मंडी में 22 प्रतिशत व औद्योगिक जिला सोलन में 21 प्रतिशत मकानों पर खतरा है।

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आइआइटी मंडी के प्रोफेसर डॉ. डेरिक्स पी शुक्ला शोधार्थी अंकित सिंह,नितेश धीमान और कीर्ति कुमार महंता के साथ साै- स्वयं

कांगड़ा व किन्नौर में अजीब विरोधाभास

शोध में सामने आया है कि कांगड़ा व किन्नौर जिलों में आपण दिन भूस्खलन होता है, लेकिन वहां आबादी पर खतरा कम है। कांगड़ा में केवल पांच व किन्नौन में 14 प्रतिशत इमारतें ही रिस्क जोन में है।

शोधार्थियों के अनुसार, इन जिलों में भूस्खल मुख्यतः गैर-रिहायशी क्षेत्रो या खाली पहाड़ी ढलानों पर होते हैं मैदानी व जनजातीय जिलों ऊन हमीरपुर और लाहुल-स्पीति में 90 प्रतिशत से अधिक निर्माण सुरक्षित है।

पारंपरिक संवेदनशीलता नक्शे केवल ढलानों व पहाड़ी मिट्टी की स्थिति बताते हैं। एआइ माडल से भूस्खलन डाटा को भवनों के बुनियादी ढांचे से जोड़ा गया है। इससे शहरी नियोजकों व आपदा प्रबंधन अधिकारियों को व्यावहारिक व सटीक डाटा मिलेगा। -प्रोफेसर डॉ. डेरिक्स पी शुक्ला, आइआइटी मंडी।