हिमाचल में ब्यास और रावी नदी की बाढ़ में अब नहीं बहेगा हाईवे, नितिन गडकरी की मौजूदगी में मेगा प्लान तैयार
हिमाचल में ब्यास और रावी नदियों के बाढ़ से राष्ट्रीय राजमार्गों और आबादी को बचाने के लिए केंद्र सरकार ने ...और पढ़ें

ब्यास नदी की बाढ़ से क्षतिग्रस्त हाईवे। जागरण आर्काइव
HighLights
ब्यास-रावी नदियों से राष्ट्रीय राजमार्गों और आबादी की सुरक्षा का मेगा प्लान।
वैज्ञानिक ड्रेजिंग को अब ईको-रिस्टोरेशन का दर्जा मिलेगा, नियमों में छूट।
नितिन गडकरी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक, विभागीय अड़चनें होंगी दूर।
हंसराज सैनी, मंडी। हिमाचल प्रदेश में हर वर्ष मानसून में ब्यास और रावी नदियों का रौद्र रूप राष्ट्रीय राजमार्गों और आसपास की आबादी के लिए तबाही लेकर आता है। इसे रोकने और राष्ट्रीय राजमार्ग के बुनियादी ढांचे को सुरक्षित करने के लिए केंद्र सरकार ने मेगा प्लान तैयार किया है। इन नदियों में वैज्ञानिक ड्रेजिंग और बाढ़ सुरक्षा के कड़े उपायों पर मंथन के लिए दिल्ली में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई है।
त्रि-स्तरीय समन्वय वाली बैठक में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री तथा केंद्रीय जलशक्ति मंत्री भी शामिल हुए। इसका उद्देश्य मंत्रालयों के बीच विभागीय अड़चनों को दूर कर जमीनी स्तर पर काम को तेजी से लागू करना है।
ब्यास नदी : मंडी, कुल्लू व मनाली फोरलेन पर 66 संवेदनशील स्थानों की पहचान
तीन वर्ष 2023, 2024 और 2025 के मानसून सीजन में ब्यास नदी ने प्राकृतिक रास्ता बदलकर कीरतपुर-मनाली फोरलेन को मंडी से मनाली तक कई जगह नुकसान पहुंचाया था। नदी के तल में भारी मात्रा में मलबा, सिल्ट और बड़े बोल्डर जमा होने से इसकी जलधारण क्षमता घट गई है।
परिणामस्वरूप बार-बार कनेक्टिविटी टूट रही है और जान-माल का भारी जोखिम पैदा हो गया है। इसे देखते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को 243.37 करोड़ रुपये की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) सौंपी गई है। जिला प्रशासन और एनएचएआइ ने संयुक्त निरीक्षण कर ब्यास नदी के किनारे 60 से 66 अति संवेदनशील स्थानों की पहचान भी कर ली है।
रावी के रौद्र रूप से चंबा की लाइफलाइन हाईवे-154ए पर मंडराता खतरा
चंबा जिले की लाइफलाइन माने जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 154ए (परेल से खड़ामुख) पर रावी नदी का दबाव लगातार घातक साबित हो रहा है। 2025 की वर्षा के दौरान रावी के उफान से इस हाईवे का एक बड़ा हिस्सा धंस गया था, जिसके चलते प्रसिद्ध मणिमहेश यात्रा कई दिन तक बाधित रही। इसके अलावा, ऊपरी क्षेत्रों में पनबिजली परियोजनाओं के कारण जलस्तर में होने वाले अचानक उतार-चढ़ाव से हाईवे के निचले हिस्से का तेजी से कटाव हो रहा है। रावी नदी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए यहां भी तुरंत वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग और चैनल ट्रेनिंग की सख्त दरकार है।
ड्रेजिंग को मिलेगा ईको-रिस्टोरेशन का दर्जा, नियमों में मिलेगी छूट
नदियों से मलबा निकालने के काम में आने वाली वैधानिक अड़चनों (जैसे फारेस्ट क्लीयरेंस) को दूर करने के लिए विशेष रणनीति बनाई जा रही है। हिमाचल सरकार की मांग पर पर्यावरण मंत्रालय ड्रेजिंग को खनन के बजाय ईको-रिस्टोरेशन (पारिस्थितिकी बहाली) और जलवायु लचीलेपन के उपाय के रूप में मान्यता दे सकता है। इसे परिवेश पोर्टल पर एक अलग श्रेणी में रखने और क्षतिपूरक वनीकरण से छूट देने पर भी विचार किया जा रहा है। बैठक में नदियों से निकाले गए मलबे के निस्तारण, परिवहन और उसके सही उपयोग के लिए एक स्थायी एसओपी बनाने पर भी मुहर लगेगी। इस पूरे अभियान में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय नोडल विभाग की भूमिका निभाएगा।
ब्यास की ड्रेजिंग आधुनिक तरीके से होने से बड़ी राहत मिलेगी। ड्रेजिंग से नदी की गहराई बढ़ेगी, जिससे फोरलेन और आबादी क्षेत्र को नुकसान नहीं होगा।
-वरुण चारी, प्रोजेक्ट निदेशक, एनएचएआई मंडी।
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