कुल्लू, मुकेश मेहरा। किसी शायर ने कहा है... हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ये लाइनें खूब बैठती हैं फागली उत्सव के दौरान फेंके जाने वाले नर्गिस के फूल पर और उस व्यक्ति पर जिसकी गोद में यह फूल गिरता है। फूल गिरने के बाद उसके जीवन में खुशहाली आती है।

सुनने में यह जरूर अजीब लगेगा परंतु उपमंडल बंजार में वासुकीनाग देवता के मंदिर के पास मनाए जाने वाले फागली उत्सव में यह अनूठी परंपरा सबको अपनी ओर आकर्षित करती है। उत्सव के दौरान देवता के गूर यानी पुजारी मुखौटा पहनते हैं और यह परंपरा चार दिन तक निभाई जाती है। अंतिम दिन नर्गिस के फूल फेंकने की परंपरा को निभाता है देवता का गूर।

वासुकीनाग देवता का मंदिर यहां पलदी घाटी के लोगों की आस्था का मुख्य केंद्र है। यहां हर वर्ष फागली उत्सव मनाया जाता है। चार दिवसीय इस उत्सव के अंतिम दिन नर्गिस का फूल जिसे स्थानीय भाषा में 'बीठ' कहा जाता है, को गूर फेंकता है। जो भी इस फूल को पकड़ता है, उसको देवता का वरदान माना जाता है। यह उसकी खुशहाली का प्रतीक होता है।

हर कार्यक्रम में शामिल होते हैं देवता

जानकार बताते हैं कि वासुकीनाग देवता आदि काल में इस घाटी में शेष नाग और काली नाग के साथ यहां आए थे। यह सबसे निचली घाटी पलदी में निवास करते हैं। यहां नजदीक के चार से पांच गांवों के लोगों की इनमें खासी आस्था है। फागली उत्सव के साथ ही बसंत ऋतु या संक्रांत का आगमन भी इसे माना जाता है। घाटी में वासुकीनाग का महत्व यह है कि यहां होने वाले हर कार्यक्रम में देवता को शामिल किया जाता है। साथ ही अन्य देवता भी समय-समय पर इनसे मिलने आते हैं। फागली उत्सव में यूं तो हर कोई भाग ले सकता है, लेकिन इस फूल को पकडऩे में स्थानीय बाशिंदों को ही महत्व दिया जाता है। इस बार फागली उत्सव के दौरान नर्गिस का फूल दूसरी घाटी के एक युवक के हाथ में आ गया। इस पर विवाद हो गया और उसे 51 सौ रुपये जुर्माना किया गया।

चबूतरे से मुखौटा पहने गूर फेंकता है फूल

फागली उत्सव में मुखौटा पहने देवता के गूर इस नर्गिस के फूल रूपी गुलदस्ते को एक टोकरी में रखते हैं और नाचते हुए यह अपने आप ही गिरता है। देवता के मुख्य गूर और अन्य सहयोगी एक चबूतरे के ऊपर बैठे होते हैं। अन्य लोग मैदान में मौजूद रहते हैं। यह आयोजन वासुकीनाग मंदिर से कुछ दूरी पर किया जाता है।

 

Posted By: Sachin Mishra

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