कमलेश वर्मा, कुल्लू। माइनस डिग्री तापमान में पथरीली सीधी चढ़ाई, छिपने के लिए एक घास का तिनका भी नहीं, ऑक्सीजन कम और दुश्मन 18 हजार फीट की ऊंचाई पर सिर पर बैठा था। बस मन में एक ही जज्बा था कि दुश्मन को अपनी जमीन से खदेड़ कर फतह हासिल करनी है। इसी जज्बे को दिल में लिए 18 ग्रेनेडियर के जवान आगे बढ़े और दुश्मन को खदेड़ कर तोलोलिंग पर भारत का तिरंगा फहराया। इसी तरह टाइगर हिल को फतह किया। देश के जवानों की वीरता की यह दास्तां 18 ग्रेनेडियर यूनिट का नेतृत्व करने वाले और कारगिल युद्ध के हीरो सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने बयां की। वे कहते हैं कि आज भी उन हालात के बारे में सोचता हूं तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। युद्ध में एक पल ऐसा नहीं था, जब जवान डगमगाए हों।

उन्होंने बताया कि कारगिल युद्ध को 20 वर्ष पूरे हो गए, लेकिन ऐसा लगता है मानों कल की ही बात हो। वर्ष 1999 में जब 18 ग्रेनेडियर यूनिट को कारगिल युद्ध में जाने के आदेश हुए तो पूरी यूनिट के नौ सौ के करीब जवान 15 मई को अन्य यूनिट के जवानों के साथ चोटी पर धाक लगाकर बैठे घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए डट गई। 18 ग्रेनेडियर ने टाइगर हिल को दुश्मनों के कब्जे से छुड़ाकर वहां पर अपना तिरंगा फहराया था। हल्की बर्फबारी और तेज हवाओं के साथ-साथ दुश्मनों की गोलियों का जवाब देते हुए 18 ग्रेनेडियर टीम ने सबसे पहले तोलोलिंग चोटी को फतह किया। युद्ध में दिन के समय जवान छोटे-छोटे पत्थरों के नीचे छिपते थे और वहां से दुश्मनों की हर हरकत पर नजर रखते थे। इस दौरान 18 ग्रेनेडियर के 35 जवानों में जिनमें से तीन हिमाचली थे, शहीद हुए और 95 घायल। घायल व शहीद हुए एक-एक जवान को आठ जवानों द्वारा नीचे पहुंचाया जाता था। कारगिल युद्ध में सभी यूनिट में हिमाचल के 52 जवान शहीद हुए हैं।

खाद्य सामग्री की जगह भरा था असला-बारूद
बकौल खुशाल ठाकुर 18 ग्रेनेडियर की कमांड़ो टीम का नेतृत्व कैप्टन बलवान सिंह ने किया था। जवानों ने अपने खाने के सामान को कम करके उस स्थान पर भी असला और बारूद भर लिया था। कारगिल युद्ध में अदम्य साहस के लिए 18 ग्रेनेडियर को 52 वीरता पुरस्कार दिए गए हैं और 18 ग्रेनेडियर का नेतृत्व करने के लिए उन्हें भी युद्ध सेवा मेडल से नवाजा गया है। खुशाल ठाकुर के अनुसार टाइगर हिल पर भारतीय सेना के तिरंगा लहराते ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के पास गए और उनसे बिना शर्त युद्ध विराम की गुहार लगाई, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि जब तक भारत की सीमा से घुसपैठियों के खदेड़ नहीं दिया जाएगा, तब तक युद्ध विराम नहीं होगा।

हिमाचल की भी हो अपनी रेजीमेंट
ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने बताया कि कारगिल युद्ध के बाद 2007-08 में उन्होंने दोबारा एक वालंटियर के रूप में कार्य किया है और उन चोटियों पर पहुंचे हैं। वहीं, इस वर्ष जैक राइफल ने जोकि कारगिल युद्ध में शामिल नहीं थे और इनमें हिमाचली जवान भी शामिल हैं, एक बार फिर कारगिल चोटी पर गई। किसी भी युद्ध की बात करें तो हिमाचल के जवानों की हर युद्ध में अहम भूमिका रही है और कई जवान मातृभूमि के लिए शहीद भी हुए हैं। उन्होंने कहा कि अफसोस है कि आज तक हिमाचल की अपनी कोई रेजीमेंट नहीं है और भर्ती कोटा आज भी उतना ही है जितना 20 साल पहले था।

युद्ध की दास्तां

-कारगिल युद्ध के हीरो ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने बताई युद्ध की दास्तां

-18 हजार फीट चोटी पर थे दुश्मन और छिपने को नहीं था घास का तिनका

-18 ग्रेनेडियर यूनिट के 35 जवानों ने पाई थी शहादत, 95 हुए थे घायल

-कारगिल युद्ध में सभी यूनिट में हिमाचल के 52 जवानों ने दी थी प्राणों की आहुति

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Posted By: Sachin Mishra

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