जागरण संवाददाता, मनाली : चेरी और स्ट्रॉबेरी से निराश बागवानों को अब सेब से ही आस है। चेरी, स्ट्रॉबेरी के बाद प्रदेश में प्लम व नाशपती की फसल भी तैयार हो गई है लेकिन कोरोना संकट इन फसलों पर भी भारी पड़ता दिख रहा है। बागवानों ने अब सेब की उम्दा फसल की उम्मीद के साथ मेहनत करना शुरू कर दी है।

प्रदेश में लगभग एक लाख 10 हजार हेक्टेयर भूमि पर सेब की पैदावार होती है। कुल्लू सहित शिमला, चंबा, लाहुल, सिरमौर, किन्नौर व मंडी के ऊपरी क्षेत्र में सेब की पैदावार हो रही है। हालांकि कोरोना संकट के चलते सेब को लेकर घाटी के बागवान अधिक लागत होने के कारण व मार्किट को लेकर कुछ समय पहले तक असमंजस में थे। क्योंकि इन दिनों तैयार हुई सब्जियों व फलों की फसल के उन्हें उचित दाम नहीं मिले, लेकिन बागवान अब नई उम्मीद के साथ सेब की उम्दा फसल तैयार करने में जुट गए है। हालांकि पर्यटन कारोबार भी कुल्लू की आर्थिकी रीढ़ है, लेकिन पर्यटन से पहले सेब पहले स्थान पर है।

घाटी के बागवान सर्वदयाल, ओम प्रकाश, दिले राम और डोला राम ने कहा कि हालांकि कुल्लू मनाली हर साल 40 लाख से अधिक पर्यटक आते है लेकिन सेब जिला की मुख्य आर्थिकी रीढ़ है। सेब की खेती से कुल्लू क्षेत्र सहित हजारों लोगों की जीवनशैली बेहतर हुई है। इस बार पर्यटन कारोबार कोरोना संकट की भेंट चढ़ चुका है। कुल्लू घाटी के बागवान सेब की उम्दा फसल की उमीद लिए खूब मेहनत कर रहे हैं। सब्जियों सहित आजकल तैयार हुए फलों के उचित दाम नहीं मिले हैं, लेकिन सेब की उम्दा फसल के साथ दाम भी उम्दा मिलने की उमीद है।

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बुरे दिनों के रूप में आया कोरोना संकट भी जल्द टल जाएगा। इस बार सेब की बंपर फसल होने की उमीद है। करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था न सिर्फ बागवानी क्षेत्र की रीढ़ है बल्कि दूसरे राज्यों के ट्रांसपोर्टर, कार्टन निर्माता, नियंत्रित तापमान वाले स्टोर, थोक मूल्य फल विक्रेता, फल प्रसंस्करण इकाइयों आदि से जुड़े हजारों लोगों के हित भी इससे जुड़े हैं।

-प्रेम शर्मा, अध्यक्ष फलोत्पादक संघ।

Posted By: Jagran

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