कुल्लू, संवाद सहयोगी । कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने पहला अभियान तोलोलिंग चोटी को फतह करने के लिए चलाया था। इस चोटी पर भारतीय सेना का कब्जा होने के बाद कारगिल की लड़ाई में एक नया मोड़ आया। तोलोलिंग युद्ध का अभियान 20 मई 1999 को शुरू हुआ था। इसका जिम्मा 18-ग्रेनेडियर्स को दिया गया। कारगिल युद्ध के हीरो और सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर आज भी उस अभियान को नहीं भूल पाते हैं।

बकौल ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर, आज भी उन्हें हर वो पल याद है कि किस तरह इस लड़ाई में उनके नेतृत्व में 18-ग्रेनेडियर्स के बहादुरों ने माइनस तापमान वाली रातों में और विपरीत परिस्थितियों में शौर्य गाथा लिखी। भारतीय रणबांकुरों ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए उन पहाड़ों पर चढ़ाई की, पहाड़ रणबांकुरों के रक्त से लाल होते रहे, परंतु अभियान नहीं रुका। 18-ग्रेनेडियर्स के तत्कालीन कमांडिंग आफिसर ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने बताया कि 'विजय या वीरगतिÓ का प्रण लेते हुए सभी रणबांकुरों ने तोलोलिंग अभियान की शुरुआत की थी। चार अधिकारियों समेत 25 जवान बलिदान दे चुके थे जो अपने आपमें बड़ी क्षति थी। दो-राजपूताना राइफल्स के तीन अधिकारियों सहित 10 जवानों ने भी बलिदान दिया। 13 जून 1999 की रात को 18-ग्रेनेडियर्स व दो-राजपूताना राइफल्स ने 24 दिन के रात-दिन संघर्ष के बाद कारगिल की लड़ाई की पहली जीत तोलोङ्क्षलग पर कब्जा करके पूरी हुई थी।

ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने बताया कि भारतीय रणबांकुरों ने बलिदान देकर तोलोङ्क्षलग अभियान को सफल बनाया था। इस संघर्ष में एक ऐसा पल भी आया जिसे वह आज भी याद करके भावुक हो जाते हैं। लेफ्टिनेंट कर्नल विश्वनाथन उनकी गोद में प्राण त्याग कर वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्होंने सभी बलिदानियों को याद करते हुए कहा कि मातृभूमि पर जान कुर्बान करने वाले उन रणबांकुरों के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

Edited By: Vijay Bhushan