शिमला, जागरण संवाददाता। हिमालय की विलुप्त मानी जाने वाली दुर्लभ प्रजाति ब्रैकिस्टेल्मा एटेनुएटम को 187 साल बाद भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के शोधकर्ता डा. अंबर श्रीवास्तव व हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में एमएससी जियोग्राफी के छात्र निशांत चौहान ने फिर खोज निकाला है। इस प्रजाति को पहली बार वर्ष 1835 में ब्रिटिश वनस्पति-विज्ञानी जान फोब्र्स रायले ने हिमाचल के डूंगी गांव से संग्रहित किया था। इसके आधार पर एक अन्य वनस्पति शास्त्री राबर्ट व्हाइट ने इसका वर्णन किया था। इसके बाद इस प्रजाति को दोबारा नहीं देखा गया। इस कारण कई विज्ञानियों ने इसे विलुप्त मान लिया था। मंडी के जोडन व हमीरपुर के थाना दरोगड़ गांव में यह प्रजाति पाई गई है। इसके औषधीय गुण पर शोध किए जा रहे हैैं।

2020 में हमीरपुर में मिले थे ब्रैकिस्टेल्मा कुल के पौधे

वर्ष 2020 में पश्चिमी हिमालय में सर्वेक्षण के दौरान निशांत चौहान को हमीरपुर जिले से ब्रैकिस्टेल्मा कुल के कुछ पौधे मिले थे। इन्हें पहचान के लिए भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण देहरादून में कार्यरत डा. अंबर श्रीवास्तव के पास भेजा गया था। वैज्ञानिक अध्ययन के बाद इन पौधों की पहचान 187 वर्ष से विलुप्त प्रजाति ब्रैकिस्टेल्मा पार्वीफ्लोरमज के रूप मे की गई। सर्वेक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने एक अन्य विलुप्त प्रजाति ब्रैकिस्टेल्मा एटेनुएटम को भी हमीरपुर व मंडी जिले से खोज निकाला है।

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस विश्वस्तरीय शोधपत्रिका अंक में करेगी प्रकाशित

लंबे अंतराल के बाद मिली विलुप्त प्रजाति की खोज के संबंध में इंग्लैंड की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा विश्वस्तरीय शोधपत्रिका ओरिक्स के जुलाई 2022 के अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस प्रजाति को वर्ष 2020 मे देखा गया था। उस समय पौधे विकास के अंतिम चरण में थे, जिस कारण इनकी पहचान की पुष्टि कर पाना संभव नहीं था। इस वर्ष मार्च में दोबारा सर्वेक्षण के दौरान इन पौधों का विस्तार से अध्ययन करने के बाद पहचान की गई।

दो वर्ष में विज्ञानियों की ओर से विलुप्त मानी गई दो दुर्लभ प्रजातियों का मिलना यह दर्शाता है कि इस भौगोलिक क्षेत्र में और सर्वेक्षणों की आवश्यता है, ताकि ऐसी अन्य दुर्लभ प्रजातियों को खोजकर उनके संरक्षण के उपाय किए जा सकें। संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए यह आवश्यक है कि इनके दोहन पर रोक लगाई जाए।

-डा. अंबर श्रीवास्तव, शोधकर्ता, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण

शोध व सर्वेक्षण में पाया कि स्थानीय लोग इस प्रजाति के कंदों को खोदकर खा जाते हैं। जिन क्षेत्रों में लोग इस प्रजाति से अनभिज्ञ हैं वहां इसकी संख्या अधिक पाई गई है। यह भी पाया गया है कि दोनों प्रजातियों की संख्या तेजी से घट रही है। इन प्रजातियों को आइयूसीएन की रेड लिस्ट के मानदंड के आधार पर गंभीर संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल करने की आवश्यकता है, ताकि समय रहते इनका उचित संरक्षण किया जा सके।

-निशांत चौहान, छात्र, एमएससी जियोग्राफी एचपीयू

Edited By: Vijay Bhushan

जागरण फॉलो करें और रहे हर खबर से अपडेट