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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 13, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Jagran Special आप उन छेरिंग दोरजे की याद से पार नहीं पा सकते जिन्‍होंने पार किए थे 200 दर्रे

By Navneet ShramaEdited By:
Published: Sat, 13 Nov 2021 03:17 PM (IST)

प्रसिद्ध इतिहासकार लेखक व विभिन्न भाषाओं के ज्ञाता छेरिंग दोरजे ठीक एक वर्ष पहले कोरोना से लड़ाई हार गए थे। ...और पढ़ें

अब केवल याद बाकी: अध्‍ययन कक्ष में छेरिंग दोरजे।
अब केवल याद बाकी: अध्‍ययन कक्ष में छेरिंग दोरजे।

कुल्‍लू, कमलेश वर्मा।

हजारों शोधार्थियों की जिज्ञासु आंखों के लिए आशा की किरण और विश्वास का स्तंभ थे छेरिंग दोरजे। प्रसिद्ध इतिहासकार, लेखक व विभिन्न भाषाओं के ज्ञाता छेरिंग दोरजे ठीक एक वर्ष पहले कोरोना से लड़ाई हार गए थे। आश्चर्य यह है कि भाषा एवं संस्कृति विभाग या जिला प्रशासन ने उनकी स्मृतियों के लिए कोई स्थायी ठिकाना अब तक नहीं ढूंढा है। तशी दावा, महाशय चमन लाल, ठाकुर राम सिंह और अभय सिंह के साथ मिल कर अटल रोहतांग सुरंग की मांग को कागज पर उतार कर दिखाया था दोरजे ने। क्योंकि इतिहास, विविध लोकसंस्कृतियां, देव समाज की मान्यताएं, परंपराओं, विविध धर्मों व भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़े इतिहास उन्हें कंठस्थ थे इसलिए उन्हें ज्ञान का भंडार कहा जाता था।

200 दर्रे पार किए

छेरिंग दोरजे भोटी भाषा के ज्ञाता थे और हिमालय, तिब्बत और मध्य एशिया की संस्कृति और इतिहास की गहरी समझ रखते थे। जिला लाहुल स्पीति की गाहर वैली के गुसख्यार गांव से संबंध रखने वाले छेरिंग दोरजे ने हिमालय के लगभग 200 दर्रों को पार किया और हिमालय की भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह से परिचित थे। साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए जापान, कोरिया रूस सहित विभिन्न देशों की यात्राएं की और वहां विश्वविद्यालयों में व्याख्यान भी दिए थे। यही नहीं, देश विदेश से भी उनके पास शोधार्थी आते थे। वह अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति के प्रदेश के उपाध्यक्ष व मार्गदर्शक भी थे।

कुल्‍लू और लाहुल में बने प्रतिमा

प्रसिद्ध साहित्यकार जयदेव विद्रोही, डा. सूरत ठाकुर, डा. गंगाराम राजी, यतिन शर्मा व डा. चंद्रमोहन परशीरा सहित अन्य साहित्यकारों के अनुसार जितना ज्ञान पश्चिमी हिमालय के बारे में उनको था, उससे हम हमेशा के लिए वंचित हो गए हैं। उनके शिष्य डा. चंद्रमोहन परशीरा कहते हैं कि दोरजे हमारी कुंजी थे जो अब हमें कभी नहीं मिलेगी। सरकार से मांग है कि उनकी स्मृति में कुल्लू या लाहुल स्पीति में प्रतिमा और साथ ही संग्रहालय भी बनाया जाए, ताकि देश दुनिया के शोधार्थियों के अलावा आने वाली पीढ़ी उनके योगदान को जान सकें।

हिंदी, पहाड़ी, लाहुल-स्पीति और विशेषकर तिब्बती भाषा का विस्तृत ज्ञान और अन्य धार्मिक व सांस्कृतिक जानकारी रखने के कारण उन्हें लाहुल स्पीति के उपायुक्त कार्यालय में तिब्बती भाषा के व्याख्याकार की नौकरी मिली थी, कुछ साल बाद उन्हें जनसंपर्क अधिकारी बनाया गया। वहीं डा मनोहर सिंह गिल जिलाधीश थे।

जार्ज रौरिक के थे मित्र

छेरिंग दोरजे रशिया के विख्यात कलाकार निकोलस रौरिक के बेटे जॉर्ज रौरिक के मित्र थे। निकोलस के ग्रीष्मकालीन निवास स्थान लाहुल स्पीति में भी रौरिक आर्ट गैलरी का निर्माण किया गया था जिसका अभी कुछ वर्ष पूर्व ही छेरिंग दोरजे ने सरकार से आग्रह करके जीर्णोद्धार करवाया था। रौरिक आर्ट गैलरी ट्रस्ट के लाहुल स्पीति के अध्यक्ष स्व. दोरजे की यह इच्छा ही रह गई कि वहां पर जो भी रूसी भाषा में किताबें और साहित्य हैं उनका हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद हो।