धर्मशाला, जागरण संवाददाता। सोयाबीन ने कब दूध देना शुरू किया और कब बाजार में बिकने लगा, पता ही नहीं चला। इसके साथ ही शहरों में धड़ल्ले से बिक रहे हैं बादाम दूध, चावल दूध, जौ दूध आदि आदि। दाम 300 से 400 रुपये प्रति लीटर तक। अब तक तो यही सुना था कि दूध गाय, भैंस, बकरी इत्यादि पशुओं से ही प्राप्त होता है। आज राष्ट्रीय दुग्ध दिवस है, तो आइए समझें कि दूध क्या है और इसका हमारे आहार के साथ आर्थिकी और समाज में क्या महत्व है।

आखिर दूध की परिभाषा क्या है

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थों को परिभाषित करना एवं उनके मानक तय करने का अधिकार और दायित्व है कोडेक्स अलिमेंटेरिअस कमिशन का। विश्व खाद्य संगठन एवं विश्व स्वास्थ्य संघ के संयुक्त प्रयास से गठित इस आयोग द्वारा निर्धारित मानकों को सभी राष्ट्र अपनाएं, ऐसी अपेक्षा है संयुक्त राष्ट्र संघ की। भारत ने इन सभी मानकों को अपनाया है और कहीं कहीं तो मानक और अधिक कठोर किए हैं, जन स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए। तो क्या है कोडेक्स के पास वैज्ञानिक, तकनीकी और वैधानिक परिभाषा दूध की? दूध देने वाले जानवरों का सामान्य स्तन स्राव जिसका तरल दूध के रूप में उपयोग किया जाता है अथवा प्रसंस्करण किया जाता है; और दुग्ध उत्पाद की परिभाषा है दूध के किसी भी प्रसंस्करण द्वारा प्राप्त उत्पाद, जिसमें खाद्य योजक व प्रसंस्करण के लिए आवश्यक सामग्री सम्मिलित हो सकते हैं।

अब किसी को कुछ भी कहने से रोका तो नहीं जा सकता, परंतु यह स्पष्ट है कि दूध पशुधन उत्पाद है, वैज्ञानिक एवं वैधानिक दोनों परिभाषाओं में। दूध के नाम पर वनस्पति आधारित वैकल्पिक पेय जो बाजार में बिक रहे हैं उन्हें दूध की संज्ञा देना हर दृष्टि से गलत है। यह भी जान लें कि वर्ष 1999 तक भैंस के दूध को भी दूध नहीं माना जाता था। भैंस आज भी भारत के अतिरिक्त गिने चुने देशों में ही है। कोडेक्स अलिमेंटरिअस कमिशन में भारत के निरंतर प्रयासों के कारण ही दूध की परिभाषा में सभी दुधारू पशु सम्मिलित किए गए, अन्यथा आज हम दूध की अपनी आधी पैदावार को भी दूध ना कह पाते।

क्या बाज़ार में मिलते पेय पोषक हैं?

आज शहरों में एक विशेष वर्ग में ये पेय पदार्थ लोकप्रिय हो रहे हैं, और इसमें कोई आपत्ति नहीं लेकिन दूध की तुलना में इनकी पोषण गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सोयाबीन, जौ, बादाम आदि में अनेक गुण हैं, पर जो इनका पैक किया पेय दूध के नाम पर बेचा जाता है उसमें चीनी, नामक, इमलसिफायर, कृत्रिम व रासायनिक स्वाद आदि का मिश्रण भी होता है। जबकि दूध में मात्र एक ही सामग्री है- दूध, और जिस में हैं शरीर और मस्तिष्क के लिए सभी आवश्यक पौष्टिक तत्व; एक संपूर्ण आहार। शाकाहारी व्यक्तियों के लिए तो दूध विशेष उपयोगी आहार है। लेकिन आजकल कुछ साधन संपन्न लोगों में प्रचलन है वीगन भोजन का; इसमें डेयरी उत्पाद भी वर्जित हैं।

भोजन की पसंद निजी है, अत: वीगन भोजन यदि कोई ग्रहण करता तो स्वागत है, परंतु एक मुहिम शुरू हो गई है इस पसंद को दूसरों पर थोपने की। विकल्प चुनें, लेकिन सक्रियता से दूर रहें- यह किसान को चोट पहुंचाता है, यह गरीबों के हितों को रगड़ लगाता है, यह पोषण सुरक्षा को हानि देता है और यह सामान्य ज्ञान को भी घायल करता है। भोजन व उसके साथ जुड़ी जीवन शैली का चुनाव करें लेकिन केवल विश्वास और भावनाओं पर नहीं, बल्कि तथ्यों और विज्ञान के आधार पर। और फिर हर कोई वीगन भोजन जैसा महंगा शौक भी नहीं रख सकता।

दूध दुनिया का सबसे अधिक लोकप्रिय आहार है, हर एक देश में इसका उपभोग होता है।

भारत का समृद्ध डेयरी व्यवसाय

डेयरी व्यवसाय के साथ विश्व में 75 करोड़ से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। हमारे लिए यह गर्व का विषय है कि दुग्ध उत्पादन में कई वर्षों से हम शिखर पर बैठे हैं। भारत ने वर्ष 2019-20 में 19.84 करोड़ टन दूध का उत्पादन किया जो संपूर्ण विश्व के उत्पादन का 22 प्रतिशत है। दूसरे स्थान पर अमरीका की पैदावार हम से आधी है। तो जरूरी है की हम अपनी आर्थिकी और जीवन में दूध के महत्व को समझें और मान्यता दें; बेहतर कल के लिए भी। 1950-51 में हमारा दूध उत्पादन केवल 1.7 करोड़ टन था, और हम दूध पाउडर के आयात पर निर्भर थे।

यहां बहती हैं दूध की नदियां

वहीं आज 406 ग्राम दूध प्रति व्यक्ति प्रति दिन उपलब्धता के साथ हम विश्व की औसत 273 से कहीं ऊपर हैं; और हिमाचल प्रदेश के लिए सुखद है कि हम 573 ग्राम प्रति व्यक्ति उपलब्धता पर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक हैं। दुग्ध के क्षेत्र में हमारी उपलब्धि का आकलन इस तथ्य से किया जा सकता है कि आज देश में दूध पैदावार का मूल्य 7,72,705 करोड़ है जो गेहूं और धान के संयुक्त कुल मूल्य 4,99,653 करोड़ से कहीं बढ़कर है। हम न केवल दुनिया के सबसे बड़े बल्कि सबसे कुशल दुग्ध उत्पादक भी हैं। अन्य फसलों की भांति दूध की बाजारी कीमत में अधिक उतार चढ़ाव भी नहीं होता। जहां एक ओर प्याज टमाटर इत्यादि की कीमतें कुछ ही माह में 10 रुपये किलो से 100 रुपये तक भी पहुंच जाती हैं, दूध की उपभोग दर में वर्ष भर मात्र आंशिक या नगण्य अंतर आता है। सबसे अच्छी बात यह है कि ग्राहक द्वारा जो दूध का खरीद मूल्य अदा किया जाता है, उसका 65 से 70 प्रतिशत मौलिक उत्पादक, अर्थात किसान को प्राप्त होता है। किसी भी अन्य कृषि उत्पाद में इतनी लागत नहीं।

दूध सिर्फ दूध नहीं हमारे लिए

भारत सरकार के मात्स्यिकी, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के पूर्व सचिव तरुण श्रीधर ने कहा कि दूध, हमारे लिए, केवल एक खाद्य वस्तु ही नहीं, अपितु ग्रामीण सशक्तिकरण और सामाजिक समानता का भी प्रतीक है। विश्व में शीर्ष स्थान तक की यात्रा केवल उत्पादन या व्यापार की उपलब्धि नहीं है। मात्र आधा लीटर दूध की थैली में सैकड़ों गाय और भैंसों का उत्पाद होता है, और असंख्य पशुपालकों की मेहनत, मुख्य रूप से महिलाएं, चाहे वे अमीर हों या गरीब, अत: यह हमारी सहकारिता की शक्ति और महत्ता का भी एक उदाहरण है। समृद्धि और बहुतायत का पारंपरिक परिचायक है दूध। इस ताकत और समृद्धि को दूध के ही नाम पर कोई छीन न ले।

Edited By: Richa Rana