कांगड़ा, नवनीत शर्मा। ‘यह उन दिनों की बात है जब मुंबई में अंधेरा छा गया था। मैं उसके बाद एक मुशायरे में गया और मैंने शे'र पढ़ा, घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्‍चे को हंसाया जाए। बाद में सीढि़यों के पास मुझे कुछ दाढि़यों ने घेर लिया और पूछा कि क्‍या एक बच्‍चा मस्जिद से बड़ा होता है। मैंने उन्‍हें कहा कि मैं नहीं जानता कि बच्‍चा बड़ा है या मस्जिद बड़ी है....इतना जानता हूं कि मस्जिद को इंसान के हाथ बनाते हैं और बच्‍चे को भगवान के हाथ सजाते हैं...।

इस आपबीती को अपनी फकीरों वाली आवाज में निदा फाजली सुना गए हैं। निदा फाजली हैं कौन? शायद हम सबके भीतर बैठा एक ऐसा मनुष्‍य जो सत्‍य का ओज बनाए रखने के लिए कभी-कभी अपने साथ भी जूझ जाता है। निदा के साथ यह बात कभी-कभी की नहीं थी। वह हमेशा ही जूझे...बालसुलभ निष्‍कपटता को औजार बना कर रूढि़यों के साथ कभी दाढि़यों के साथ। व्‍यवस्‍था के प्रति क्रोधित दिखने का चलन उन्‍होंने नहीं अपनाया। कोई विशेष परचम उठाए बिना निदा फाजली ने सबको एक नजर से डांटा, डपटा और समझाने की कोशिश भी की। लहजा कबीराना यानी संतों वाला रहा। और संतों की विशेषता होती है कि वे स्‍वयं बालमन रखते हैं....जिनके सम्‍मुख सब कसौटी पर होते हैं। आज कुछ रेखाचित्रों पर हत्‍याएं हो जाती हैं लेकिन निदा का हौसला देखें कि वह ऐसा दोहा कह सके:

बच्‍चा बोला देख कर मस्जिद आलीशान

अल्‍ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान

निदा की शायरी में बच्‍चे जितने भावावेग के साथ आए हैं, उतनी शिद्दत से बच्‍चों से जुड़े अन्‍य बिंब आए हैं। जादू का खिलाैना, सोच समझ वालों को नादानी दे मौला का आग्रह करने वाले, चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे जैसी पंक्तियां अचानक तो नहीं उतरती। प्रसिद्ध शायर शहरयार का एक शे'र है:

जिंदगी जैसी तवक्‍को थी नहीं, कुछ कम है

हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है

व्‍यर्थताबोध, कहीं कुछ कम रह गया...ऐसी अनुभूति संसार के हर भाषा के साहित्‍य में अभिव्‍यक्‍त हुई है। लेकिन जादू के खिलौने वाले निदा अलग थे, इसलिए उनका दृष्टिकोण देखें:

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया

बच्‍चों के स्‍कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया

निदा भी इस सोच से निकले होंगे इसीलिए अपने आरंभिक दौर में भूपेंद्र की आवाज में उन्‍होंने कहा था:

कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता

कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता।

बच्‍चों के बिंब विधान से निदा फाजली के गहन संबंध का एक उदाहरण देखिए हमें कहां ले जाता है:

घास पर खेलता है इक बच्‍चा

पास मां बैठ मुस्‍कराती है

मुझको हैरत है जाने क्‍यों दुनिया

काबा ओ सोमनाथ जाती है

बड़ा शायर अपने शब्‍द कैसे बनाता है, उस दृष्टिकोण से यह शे'र 'बेकारन' शब्‍द के होते हमेशा स्‍मरण रहने वाला है:

उसको भूले बरसों गुजरे आज न जाने लेकिन क्‍यों

आंगन में हंसते बच्‍चों को बेकारन धमकाया है

यह शे'र प्रेम के प्राप्‍त न होने की झल्‍लाहट, खिसियाहट का शे'र है लेकिन शायर के प्रतीकों में बच्‍चे किस प्रकार रच बस गए हैं कि बेकारन डांट खाने वाला कोई और नहीं है।

निदा फाजली कहते थे:

नक्‍़शा उठा के कोई नया शहर ढूंढि़ए

इस शहर में तो सबसे मुलाकात हो गई

और निदा फाजली ने ही यह भी कहा कि :

अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं

रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम हैं

वही निदा फाजली जब जयपुर जाते हैं तो पांच साल की बच्‍ची की शपिंग के लिए जो वातावरण बनता है, उस पर नज्‍म कहने के लिए विवश हो जाते हैं। एक बच्‍ची के लिए कैसे दाढि़यां, पगडि़यां तथा ऊंट छोड़ कर सब लोग कैसे इतिहासों का जाल काटने का दृश्‍य बनाते हैं, वह यूं है:

गोटे वाली

लाल ओढ़नी

उस पर

चोली-घागरा

उसी से मैचिंग करने वाला

छोटा सा इक नागरा

छोटी सी!

ये शापिंग थी

या!

कोई जादू-टोना

लम्बा चौड़ा शहर अचानक

बन कर

एक खिलौना

इतिहासों का जाल तोड़ के

दाढ़ी

पगड़ी

ऊंट छोड़ के

'अलिफ़' से

अम्मां

'बे' से

बाबा

बैठा बाज रहा था

पाँच साल की बच्ची

बन कर जयपुर

नाच रहा था

निदा फाजली शायरी की वह बड़ी इमारत हैं जो बहुत बड़ी है, जिसके कई प्रवेशद्वार हैं। जो जिधर से प्रवेश करेगा, वहीं का वृतांत कह पाएगा। इस दृष्टि से उन पर कुछ भी लिखा जाए, उसका समापन नहीं हो सकता....लिखना क्रमश: ही रहेगा। निदा साहब को जन्‍मतिथि पर आदरांजलि।

Edited By: Sanjay Pokhriyal