धर्मशाला, नवनीत शर्मा। American Satyanand Stokes, महात्मा गांधी के संपर्क में आकर आजीवन खादी पहनने वाले, भारत के पहाड़ों की आर्थिकी में सेब की लाली भरने वाले, स्थानीय बोली और संस्कृत सीखने वाले एकमात्र अमेरिकी थे सैमुअल इवांस स्टोक्स, जो बाद में सत्यानंद स्टोक्स हो गए। भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से आजाद करने में योगदान देने वाले सनातन धर्म के अनुयायी सत्यानंद स्टोक्स के बारे में नवनीत शर्मा का विशेष आलेख...

जिस देश में रहना, जिस देश का खाना, बस वहीं के होकर रह जाना। इस संदेश के साथ यह कहानी उस इकलौते अमेरिकी की है जो युवावस्था में ईसाइयत का प्रचार करने भारत आया किंतु स्वयं सनातन धर्म को मानने लगा और इतना भारतीय हो गया कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम में शामिल होने पर छह माह जेल काटी। कुष्ठ रोग से लड़ते हिमाचलियों के घावों पर फाहा थे सैमुअल इवांस स्टोक्स, जो बाद में सत्यानंद स्टोक्स हो गए थे। जानते हैं उन्हीं सत्यानंद स्टोक्स के बारे में जिन्होंने भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करने में अपनी भूमिका निभाई।

गांधी जी ने भी की प्रशंसा

‘उसने भारतीयों के बारे में, भारतीयों के साथ भारतीय बनकर सोचा। अपने दुख बांटे और भारतीयों के संघर्ष में कूद गया। ब्रिटिश सरकार के लिए यह बहुत कष्टप्रद साबित हुआ है। उन्हें सरकार की आलोचना के लिए खुला छोड़ देना सरकार के लिए असहनीय था। इसीलिए उनका गोरा रंग गिरफ्तारी से उनकी सुरक्षा नहीं कर सका।’ महात्मा गांधी के ये शब्द भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने व जेल जाने वाले इकलौते अमेरिकी सैमुअल इवांस स्टोक्स के बारे में थे, जब सैमुअल इवांस को गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तार इसलिए किया गया क्योंकि वाघा में उन्होंने प्रिंस आफ वेल्स एडवर्ड आठवें की भारत यात्रा का विरोध किया था। बात 1920 की है जबकि सत्यानंद 1905 में हिमाचल आ गए थे। जाहिर है, वह भारत के साथ इस तरह एक हो गए थे कि उन्होंने भी स्वयं को गुलाम ही समझकर भारत की गुलामी को समझा।

जुड़ गए भारतीय संस्कृति से

सैमुअल स्टोक्स आए तो ईसाइयत का प्रचार करने थे, लेकिन जब ठान लिया कि अब भारत में ही रहना है तो यह भी तय कर लिया कि भारत में रहूंगा तो भारत का होकर रहूंगा। आज ऐसे कई तत्व सहज ही दिख जाते हैं जिनका रहना-खाना भारत में होता है, लेकिन वे गुणगान विदेशी धरती का करते हैं। इनमें सत्यानंद स्टोक्स भारत की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी जरूरतों के अलावा स्वाधीनता संग्राम और संस्कृत-संस्कृति के साथ भी जुड़े।

साथ लाए सेब की रंगत

वास्तविकता यह है कि सैमुअल स्टोक्स से सत्यानंद स्टोक्स बनने की यात्रा में केवल सेब ही कारक नहीं, बल्कि कई ‘स’ रहे, जिन्हेंं हम सनातन धर्म, संवेदना, समर्पण, सहानुभूति, सदिच्छा, सद्भावना, स्वाभिमान और सन्मार्ग की खोज के रूप में देख सकते हैं। आज हिमाचल प्रदेश सेब राज्य है तो केवल सत्यानंद स्टोक्स के कारण। कहां येल यूनिवर्सिटी और कहां सोलन जिले में सुबाथू के कुष्ठ रोग केंद्र। बाद में ठिकाना बना शिमला से ऊपर कोटगढ़ और थानाधार कर्मभूमि बनी। जहां भाषा के नाम पर कई पक्ष अपनी कलई स्वयं खोल देते हैं, स्टोक्स ने हर भारतीय को यह महसूस करवाने के लिए, कि वह उनके बीच के ही हैं, स्थानीय भाषा-बोली भी सीखी। 1914 में अमेरिका गए तो यहां की मिट्टी के नमूने भी ले गए। लौटे तो रायल डिलीशियस प्रजाति के सेबों के पौधे भी लाए। 1928 तक हिमाचल की पहचान सेब क्षेत्र के रूप में हो गई थी। इस बीच वह स्कूल भी आरंभ कर चुके थे।

दिव्यात्मा सा था अंदाज

इस दौरान उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया। कांग्रेस के सदस्य बन गए और नागपुर सत्र में भी शिमला क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने लगे। स्थानीय जागीरदार जिस बेगार प्रथा से आम आदमी को सता रहे थे, उसका विरोध किया। 1932 में उन्होंने सनातन धर्म अपना लिया। अब नाम हो गया सत्यानंद और पत्नी का नाम हो गया प्रिया देवी। ठियोग के सेब बागवान और बिजली अभियंता सुरेंद्र ठाकुर कहते हैं, ‘सत्यानंद स्टोक्स बेशक एक मनुष्य थे, उनकी सोच और उनके किए गए कार्यों से यह कोई अतिशयोक्ति नहीं कि वह दिव्यात्मा थे। सत्यानंद जी ने अपना धर्म, नाम और पहचान सब सनातन धर्म में विलीन कर दिया। हिमाचल प्रदेश के लोगों के लिए अपना सब कुछ लगा दिया, उनमें अवश्य ही कोई दैवीय शक्ति थी। उन्होंने जो किया, वह कोई साधारण व्यक्ति कर ही नहीं सकता।’ कुछ साधुओं के कहने पर श्रीमद्भगवद्गीता भी पढ़ी। बाद में संस्कृत भी सीख ली। आजीवन खादी पहनने वाले सत्यानंद स्टोक्स का आज की पीढ़ी भी सम्मान करती है तो उसके पीछे सत्यानंद का भारत, भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति प्रेम है। सत्यानंद ने जीवन को किस तरह देखा, उनकी दुर्लभ पुस्तक ‘सत्यकाम’ इस पर प्रकाश डालती है।

Edited By: Rajesh Kumar Sharma