शिमला, यादवेन्द्र शर्मा।

Health Survey, बच्चों का खाना व खिलाने का ढंग खरा नहीं है। अभिभावकों की लापरवाही और फास्ट फूड बच्चों को कुपोषित बना रहे हैं। यही कारण है कि हिमाचल प्रदेश के छह जिलों में पांच वर्ष से कम आयु के 30 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषित हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-पांच के अनुसार सिरमौर और शिमला जिला को छोड़ शेष 10 जिलों में कुपोषण दर बीते वर्ष की अपेक्षा बढ़ी है। प्रदेश सरकार की ओर से लाखों रुपये कुपोषण को दूर करने के लिए खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन उन तक इसका लाभ नहीं पहुंच पा रहा।

कुपोषित यानी कम वजन, कम लंबाई और मोटापे के असर वालों में सुविधा संपन्न घरों के बच्चे भी शामिल हैं। शिशु रोग विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत से अभिभावकों को बच्चों की डाइट का पता नहीं है। राज्य में 80 प्रतिशत बच्चे फास्ट फूड के आदी हैं। इस कारण भी कुपोषित व मोटापे की चपेट में आए बच्चों का आंकड़ा ज्यादा है। प्रदेश में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे बीते वर्षों की अपेक्षा ज्यादा कुपोषित पाए गए हैं। प्रदेश में कुपोषित बच्चों का आंकड़ा 38 प्रतिशत है, जबकि अनिमिया का आंकड़ा 53 प्रतिशत।

इसी कारण प्रदेश में अब बच्चों में कुपोषण को दूर करने के लिए 65 करोड़ की बाल सुपोषण योजना में सात प्रमुख ङ्क्षबदुओं के तहत कार्य होगा।

कुपोषण व मोटापे के प्रमुख कारण

-माता-पिता की लापरवाही।

-बच्चों में फास्ट फूड की आदत।

-गर्भावस्था के दौरान मां का उचित आहार न लेना।

-माता-पिता को बच्चों की सही डाइट का पता न होना।

-बच्चों को ज्यादा खाने की आदत डालना।

-योजनाओं का जरूरतमंद तक न पहुंचना।

-समय से पहले बच्चों का पैदा होना।

-बच्चों में योग व्यायाम और खेलने की कमी।

कुपोषण के लक्षण

-गंभीर कुपोषण का शिकार बच्चों में सूखा रोग, पैरों में सूजन, बीमार रहना, भूख न लगना, जीभ पर जख्म और आंख व हथेली सफेद होने जैसे लक्षण होते हैं।

-बच्चों में दस्त, खसरा, निमोनिया और अन्य बीमारियों से मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है।

-दो वर्ष तक बच्चे की सेहत की उपेक्षा की तो कुपोषण का शिकार होने से ऐसे बच्चों की सेहत और मानसिक विकास प्रभावित होता है।

-यह बच्चे कमजोर, पढ़ाई में कम ध्यान देने वाले, हर विषय में कम रुचि लेने वाले हो सकते हैं।

छह से नौ माह के बच्चे की डाइट व सावधानी

-छह से नौ माह के बच्चे को मसली सब्जियां व फल, अनाज व दलिया आदि दिन में दो से तीन बार दें।

-शुरू में दो से तीन चम्मच दें, जिसे बढ़ा कर एक-दो कटोरी तक दिया जा सकता है।

-छोटे बच्चों को खिलाते हुए धीरज रखें। बार-बार प्रोत्साहित करें। धीरे-धीरे भोजन की मात्रा बढ़ाते रहें।

-मां का दूध बच्चे की मांग पर पिलाएं।

-खाना नरम व गाढ़ा हो, जिसे बच्चा आसानी से खा सके और पचा सके।

-हर दिन खाना बदल कर दें। नमकीन या मीठा जो बच्चे को पसंद हो वो दें।

-गोद में बिठाकर प्यार से बातें करते हुए संयम से खाना खिलाएं।

नौ माह के बाद डाइट और सावधानी

-बच्चे को छोटे टुकडों में मसला हुआ भोजन या आहार दें।

-बच्चे के भोजन में एक चम्मच घी अथवा गुड डालने से भोजन में ऊर्जा बढ़ती है।

-धूप में कुछ देर बच्चे को बिठाएं।

-थोड़ा-थोड़ा खाना बार-बार खिलाएं।

-समय-समय पर बच्चे का वजन करवाएं।

विटामिन के साथ लौह तत्व जरूरी

पांच वर्ष की आयु तक हर छह माह में विटामिन ए की खुराक पिलाना जरूरी है। छह माह की आयु से ताकत के लिए लौह तत्व जरूरी है। छह माह में एक बार पेट के कीड़े मारने की दवा चिकित्सक से लिखवा कर जरूर दें। समय पर बच्चों का टीकाकरण जरूर करवाएं। फल, सब्जी, दूध, दही व पनीर आदि अवश्य डाइट में शामिल करें।

80 प्रतिशत बच्चे जो स्वास्थ्य जांच के लिए आते हंै फास्ट फूड के आदी हैं। इससे बच्चों का वजन और कद काठी कम हो रही है। स्वजन को पता ही नहीं कि बच्चों की क्या डाइट होनी चाहिए।

-डा. मंगला सूद, विशेषज्ञ शिशु रोग आइजीएमसी, शिमला।

बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। मुख्यमंत्री बाल सुपोषण योजना में 11 लाख बच्चों के साथ धात्री महिलाओं और किशोरियों की भी निगरानी की जा रही है। उन्हें निरोग के साथ कुपोषण मुक्त किया जाएगा। पौष्टिक आहार के साथ स्वास्थ्य जांच की जा रही है।

-रुपाली ठाकुर, निदेशक, महिला एवं बाल विकास विभाग।

सर्वे रिपोर्ट में सामने आए तथ्य

जिला,छोटे कद वाले, कम भार

जिला,2015-16,2019-20,2015-16,2019-20,

चंबा,29.9,42.6,22.5,26.0

बिलासपुर,27.2,40.01,23.4,38.8

कुल्लू,,19.0,35.9,11.0,25.6

सोलन,27.6,32.3,29.4,26.7

किन्नौर,18.4,32.2,15.9,18.9

मंडी,26.3,31.3,16.2,21.3

सिरमौर,23.5,28.6,25.3,24.2

कांगड़ा,25.6,28.0,23.3,32.0

हमीरपुर,29.3,27.3,19.4,23.6

शिमला,30.3,27.1,24.8,14.9

ऊना,22.6,24.7,5.9,14.6

लाहुल स्पीति,9.8,19.7,7.3,10.3

कुल,26.3,30.8,,21.2,25.5

नोट : हिमाचल में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में 10698 परिवारों, 10638 महिलाओं और 1477 पुरुषों को शामिल किया गया। आंकड़े प्रतिशत में हैं।

सरकारी योजनाएं और उद्देश्य

-समेकित बाल सरंक्षण योजना : जरूरतमंदों को बालक एवं बालिका आश्रम में शिक्षा, भोजन व स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा देना।

-समेकित बाल विकास योजना : गर्भवती, दूध पिलाने वाली माताएं तथा छह माह से छह साल के बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से पोषाहार, पाठशाला से पहले शिक्षा व टीकाकरण करवाना।

-मिड-डे मिल योजना : सरकारी स्कूलों में पहली से आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए दोपहर का पोषित भोजन।

-स्कूल हेल्थ प्रोग्राम :बच्चों के स्वास्थ्य की निश्शुल्क जांच, उपचार, दवा व आपरेशन।

-ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण समिति : समुचित पोषण संबंधी परामर्श, बच्चों का नियमित और पूर्ण टीकाकरण, बच्चों के शारीरिक और बौद्धिक विकास की निगरानी।

इसलिए लोगों तक नहीं पहुंच रहा योजनाओं का लाभ

कुपोषण को दूर करने के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक नहीं पहुंचने के कई कारण हैं। केंद्र और प्रदेश सरकार द्वारा निर्धारित पोषक तत्वों जैसे दलिया व सोयाबीन पाउडर आदि का बच्चे उस तादाद में उपयोग नहीं कर रहे हैं, जिस आधार पर दिया ज रहा है। इसके अलावा जो सामान दिया जा रहा है आंगनबाड़ी केंद्रों से उस अनुपात में आगे नहीं दिया जा रहा है। बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्हें पता ही नहीं कि पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए खाद्य पदार्थ दिए जाते हैं या उसकी मात्र कितनी है। जिन बच्चों को बाल व बालिका आश्रम में आश्रय नहीं मिला है खाद्य पदार्थ मापदंड के तहत नहीं मिल रहे हैं।

Edited By: Virender Kumar